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आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
शन्तनुः खलु गङ्गां भागीरथीमुपय़ेमे |
५० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १४
धृतराष्ट्र उवाच
शन्तनुः पालय़ामास यथावत्पृथिवीमिमाम् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
शन्तनुप्रमुखैर्गुप्ते लोके नृपतिभिस्तदा |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
शन्तनुश्च महीं लेभे वाह्लीकश्च महारथः ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय १२५
लोमश उवाच
शन्तनुश्चात्र कौन्तेय़ शुनकश्च नराधिप |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
शन्तनुश्चापि शोकार्तो जगाम स्वपुरं ततः |
४५ क
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
शन्तनुश्चैव राजर्षिः पाण्डुश्चैव पिता तव ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
शन्तनुस्तु महीपालोऽभवत् |
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
शन्तनो राजसिंहस्य देवराजसमद्युतेः ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
शन्तनो राजसिंहस्य भरतस्य च धीमतः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
शन्तनोः सन्ततिं तन्वन्पुण्यकीर्तिर्महाय़शाः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
शन्तनोरपि सन्तानं यथा स्यादक्षय़ं भुवि |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
शन्तनोर्धर्मनित्यस्य कौरव्यस्य यशस्विनः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
शन्तनोर्धर्मशीलस्य न त्वेतच्छमकारणम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
शन्तनोर्वेश्मनि पुनस्तेषां चारोहणं दिवि ||
७८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
शन्तनोश्चैव पुत्रेण प्राज्ञेन विदुरेण च |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
शन्तनौ पृथिवीपाले नावर्तत वृथा नृप ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
शन्दादीन्विषय़ांस्तस्मादसंरागादनुप्लवेत् |
८ क
वन पर्व
अध्याय १३८
लोमश उवाच
शपन्तीष्टान्सखीनार्तास्तेभ्यः पापतरो नु कः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
शपे माधव सख्येन सत्येन सुकृतेन च |
६८ क
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
शपे राजन्यथा ह्यद्य निहनिष्यामि सोमकान् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
शपे सात्वत पुत्राभ्यामिष्टेन सुकृतेन च |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
शपेऽहं कृष्णचरणैरिष्टापूर्तेन चैव ह |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
राम उवाच
शपेय़ं त्वां न चेदेवमागच्छेथा विशां पते |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
शपेय़ं त्वां महाराज पराभावाय़ भारत ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
शल्य उवाच
शपेय़ं त्वां महाराज पराभावाय़ वै रणे ||
७४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
शपेय़ं त्वां महाराज पराभावाय़ सर्वशः ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
कृप उवाच
शपेय़ं त्वां महाराज पराभावाय़ सर्वशः ||
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
देवशर्मो उवाच
शपेय़ं त्वामहं क्रोधान्न मेऽत्रास्ति विचारणा ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच
शप्तं संरम्भिणोग्रेण कुरूणां शृण्वतां तदा ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
अहल्यो उवाच
शप्तः स पार्थिवो नूनं व्राह्मणं तं वधिष्यति ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
शप्तस्तु भृगुणा वह्निः क्रुद्धो वाक्यमथाव्रवीत् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय २५
कश्यप उवाच
शप्तस्त्वेवं सुप्रतीको विभावसुमथाव्रवीत् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ३३
वासुकिरु उवाच
शप्ता इत्येव मे श्रुत्वा जाय़ते हृदि वेपथुः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
शप्ताः स्म इति जानन्त ऋषिं तमुपचक्रमुः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
शप्तानां नो महादेव्या नान्यदस्ति पराय़णम् |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय ७२
कच उवाच
शप्तो नार्होऽस्मि शापस्य कामतोऽद्य न धर्मतः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
यक्ष उवाच
शप्तो वैश्रवणेनास्मि त्वत्कृते पार्थिवात्मज |
५१ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
शप्तो ह्येष पुरा पापो वधूं रम्भां परामृशन् |
५९ क
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
शप्तोऽपराधे कस्मिंश्चित्तस्यैषा निष्कृतिः कृता ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
शप्तोऽसि मम पुत्रेण यत्तो भव महीपते |
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
शप्त्वा च तान्महाभागस्तपस्येव मनो दधे |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
शप्त्वा तु शपथान्घोरान्सर्वसैन्यस्य पश्यतः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
शप्स्यत्यसंशय़ं कोपाद्दिव्यज्ञानो महातपाः ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय २९०
सूर्य उवाच
शप्स्यामि त्वामहं क्रुद्धो व्राह्मणं पितरं च ते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
शप्स्ये तस्मात्सुसङ्क्रुद्धो भवन्तं तं निवोध मे |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ३८
शमीक उवाच
शम एव यतीनां हि क्षमिणां सिद्धिकारकः |
९ क
सभा पर्व
अध्याय ६८
भीमसेन उवाच
शमं गन्तास्मि नचिरात्सत्यमेतद्व्रवीमि वः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७५
भगवानु उवाच
शमं चेत्ते करिष्यन्ति ततोऽनन्तं यशो मम |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
शमं चेद्याचमानं त्वं प्रत्याख्यास्यसि केशवम् |
२७ क