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द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
ततो वादित्रघोषेण स्वान्योधानभिहर्षय़न् |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
ततो वादित्रनिर्घोषैर्मङ्गल्यैश्च स्तवैः शुभैः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
ततो वादित्रनृत्ताभ्यामुपातिष्ठन्त तौ स्त्रिय़ः |
८ क
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
ततो वानरकोटीभिर्यां वय़ं प्रस्थिता दिशम् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
ततो वामेन कौन्तेय़ः पीडय़ित्वा शरासनम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ततो वाराणसीं गत्वा अर्चय़ित्वा वृषध्वजम् |
६९ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो वालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम् |
९१ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो वालेन तेनैवमुक्तस्यासीत्तदा मम |
९० क
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वाष्पं समुत्सृज्य सह पुत्रैस्तथा पृथा |
११ क
वन पर्व
अध्याय ५३
वृहदश्व उवाच
ततो वाष्पकलां वाचं दमय़न्ती शुचिस्मिता |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
ततो वासं परीक्षेत धर्मनित्येषु साधुषु |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
ततो वासगृहं शुभ्रं पन्नगेन्द्रस्य संमतम् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
ततो वाहान्समाश्वास्य सर्वे युद्धाभिनन्दिनः |
४८ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वाहू समुच्छ्रित्य निवार्य च सभासदः |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
ततो वाह्वोर्ललाटे च हृदि चैव युधिष्ठिरः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय ९७
लोमश उवाच
ततो वाय़ुः प्रादुरभूदगस्त्यस्य महात्मनः |
७ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वाय़ुः सुखस्पर्शः पुण्यगन्धवहः शिवः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वाय़ुर्महाघोषः क्षोभय़न्सर्वसागरान् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वाय़ुर्महाञ्शीघ्रो नीचैः शर्करकर्षणः |
२ क
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वाय़ुर्महाराज दिव्यैर्माल्यैः सुगन्धिभिः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वाय़ुसुतः क्रोधात्स्ववाहुवलमाश्रितः |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
ततो वाय़ोः प्रकम्पाच्च सूर्यस्य च मरीचिभिः |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विकर्णस्य धनुर्विकृष्य; जाम्वूनदाग्र्योपचितं दृढज्यम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
ततो विकृतचेष्टौ द्वौ पुरुषौ समुपस्थितौ |
८३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
ततो विक्षिपतः खड्गं सौभद्रस्य यशस्विनः |
६६ क
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
ततो विगणय़न्राजा मनसा कोसलाधिपः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
ऋषय़ ऊचुः
ततो विगतसन्त्रासा वय़मप्यरिकर्शन |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
ततो विग्रहवन्तौ तौ वेदान्दृष्ट्वासुरोत्तमौ |
२६ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
इन्द्र उवाच
ततो विचार्य क्रिय़तां धर्मराज; त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
ततो विचार्य वहुधा रथमार्गेषु तान्हय़ान् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
ततो विचुक्रुशुः सर्वे हा हेति च समन्ततः ||
५७ ख
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विजिग्ये वलवान्राज्ञः पर्वतवासिनः ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विजित्य सङ्ग्रामे कुरून्गोवृषभेक्षणः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
ततो विज्ञातचारित्रः सत्कृत्य स विमोक्षितः |
६८ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विततधन्वानं द्रोणस्तं कुरुनन्दनम् |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
ततो वितिमिरे जाते देवाः शकुनिमार्दय़न् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
ततो वितिमिरो लोकः क्षणेन समपद्यत |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
ततो वित्तं विविधं संनिधाय़; यथोत्साहं कारय़ित्वा च कोशम् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय ५१
वृहदश्व उवाच
ततो विदर्भपतय़े दमय़न्त्याः सखीगणः |
५ क
वन पर्व
अध्याय ६७
वृहदश्व उवाच
ततो विदर्भाधिपतेर्निय़ोगाद्व्राह्मणर्षभाः |
७ क
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
ततो विदर्भान्यास्यामि कुरुष्वेदं वचो मम ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
ततो विदर्भान्सम्प्राप्तं साय़ाह्ने सत्यविक्रमम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
ततो विदह्यमानं मामुवाच भगवान्रविः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
ततो विदह्यमानोऽहं प्रविष्टोऽम्भस्तदानघ |
८ क
वन पर्व
अध्याय १९०
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो विदित्वा नृपतिं निपातित; मिक्ष्वाकवो वै दलमभ्यषिञ्चन् ||
६९ ख
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विदित्वा पार्थस्त्वां प्रतिय़ोत्स्यति वा न वा ||
३२ ग
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
ततो विद्धश्च वहुभिः सर्वमर्मसु साय़कैः ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
ततो विद्यावय़ोवृद्धैः क्रिय़ावद्भिर्जितेन्द्रिय़ैः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
ततो विद्युत्प्रभैर्वाणैः कार्तस्वरविभूषितैः |
९६ क
सभा पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विद्वान्विदुरं मन्त्रिमुख्य; मुवाचेदं धृतराष्ट्रो नरेन्द्रः |
२० क