सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
अग्निहोत्रफला वेदा दत्तभुक्तफलं धनम् |
१०१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवृत्तफलं श्रुतम् |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
पशुसख उवाच
अग्निहोत्रमनादृत्य सुखं स्वपतु स द्विजः |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
अग्निहोत्रमुपासंश्च जुह्वानश्च यथाविधि ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निहोत्रस्य दुष्टस्य प्राय़श्चित्तार्थमुल्वणान् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०६
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निहोत्राणि विप्रास्ते प्रादुश्चक्रुरनेकशः ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
अग्निहोत्राणि साय़ाह्ने न चाहूय़न्त सर्वशः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
अग्निहोत्राण्यग्निशेषं हविर्भाजनमेव च |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निहोत्राण्युपादाय़ सहदेवस्तु पर्वते ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निहोत्रात्समुत्थाय़ हर्षेण महतान्विता |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१८४
सरस्वत्यु उवाच
अग्निहोत्रादहमभ्यागतास्मि; विप्रर्षभाणां संशय़च्छेदनाय़ |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अग्निहोत्री च यो विप्रो ग्रामवासी च यो भवेत् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निहोत्रे च धर्मे च दमे च सततं रता |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
अग्निहोत्रे प्रसक्तः सन्भीषितः प्रमुमोह वै ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२१०
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निहोत्रे हूय़माने पृथिव्यां सद्भिरिज्यते ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
अग्निहोत्रेषु सत्रेषु क्रिय़ास्वथ मखेषु च ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निहोत्रैस्ततस्तेषां हूय़मानैर्महात्मनाम् |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
अग्निय़ोगवहो ग्रीष्मे विधिदृष्टेन कर्मणा |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
अग्नी रूपं पय़ः स्रोतो वाय़ुः स्पर्शनमेव च |
५० क
आदि पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
अग्नींश्च विधिवज्जुह्वन्वानप्रस्थविधानतः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
अग्नींश्च व्राह्मणांश्चार्चेद्देवताः प्रणमेत च |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
अग्नींश्च व्राह्मणांश्चार्चेद्देवताः प्रणमेत च |
८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
अग्नींस्तु याजकास्तत्र जुहुवुर्विधिवत्प्रभो |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्नीनां विविधो वंशः कीर्तितस्ते मय़ानघ |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पितो उवाच
अग्नीनाधाय़ विधिवच्चेष्टय़ज्ञो; वनं प्रविश्याथ मुनिर्वुभूषेत् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
अग्नीनाधाय़ विधिवत्प्रय़ता धारय़न्ति ये |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
अग्नीनाधाय़ सापत्यो यजेत विगतज्वरः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
अग्नीनामतिथीनां च शुश्रूषुरनसूय़िका |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
अग्नीनामव्ययं ह्येतद्धौम्यं वेदविदो विदुः |
४५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
अग्नीनाहृत्य विधिवच्चितां प्रज्वाल्य सर्वशः |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अग्नीनुत्पाद्य यत्नेन क्रिय़ाः सुविहिताश्च याः |
१२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
अग्नीनुपशय़ानस्य राजपौरुषमुच्यते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
अग्नीन्परिचरन्सम्यक्स्वाध्याय़परमो द्विजः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
अग्नीन्सङ्कल्पय़ामास होत्रे चात्मानमेव च ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्नीन्साजनय़त्पुण्यान्षडेकां चापि पुत्रिकाम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
अग्नीषोमं वैश्वदेवं धान्वन्तर्यमनन्तरम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
अग्नीषोमकृतैरेभिः कर्मभिः पाण्डुनन्दन |
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
गङ्गो उवाच
अग्नीषोमात्मकं चैव जातरूपमुदाहृतम् ||
८० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
अग्नीषोमात्मकं तस्माज्जगत्कृत्स्नं चराचरम् ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
अग्नीषोमाविदं सर्वमिति यश्चानुपश्यति |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
अर्जुन उवाच
अग्नीषोमौ कथं पूर्वमेकय़ोनी प्रवर्तितौ |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
अग्नीषोमौ जगत्कृत्स्नं वैष्णवं चोच्यते जगत् ||
८४ ख
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
अग्नीषोमौ तथेन्द्राग्नी मित्रोऽथ सवितार्यमा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भीष्म उवाच
अग्नीषोमौ तु चन्द्रार्कौ नय़ने तस्य विश्रुते ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
अग्नीषोमौ हि तच्छुक्रं प्रजनः पुष्यतश्च ह ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
मन्दपाल उवाच
अग्ने त्वमेव ज्वलनस्त्वं धाता त्वं वृहस्पतिः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
२०
सूत उवाच
अग्ने मा त्वं प्रवर्धिष्ठाः कच्चिन्नो न दिधक्षसि |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
अग्नेः पुत्रः कुमारस्तु श्रीमाञ्शरवणालय़ः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
अग्नेः पुरे नरः स्नात्वा विशालाय़ां कृतोदकः |
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
अग्नेः प्रज्वलितस्येव अपि मुच्येत मे प्रजा ||
३१ ख