अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
सुखं ते प्रतिवुध्यन्ते सुसुखं प्रस्वपन्ति च ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
सुखं ददाति प्रीतात्मा भक्तानां भक्तवत्सलः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
सुखं दान्तः प्रस्वपिति सुखं च प्रतिवुध्यते |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
सुखं दान्तः प्रस्वपिति सुखं च प्रतिवुध्यते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
सुखं दुःखं परं येषां सत्यं येषां पराय़णम् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
सुखं दुःखं भवोऽभावो भय़ं चाभय़मेव च ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
सुखं दुःखं महद्ध्रस्वं कर्म यत्समुपागतम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
सुखं दुःखान्तमालस्यं दाक्ष्यं दुःखं सुखोदय़म् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
सुखं दुःखान्तमालस्यं दुःखं दाक्ष्यं सुखोदय़म् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
पिङ्गलो उवाच
सुखं निराशः स्वपिति नैराश्यं परमं सुखम् |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
सुखं निवासं जहतां हि तेषां; न प्रीतिरासीद्भरतर्षभाणाम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
सुखं नैवेह नामुत्र लभन्ते पुरुषाधमाः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
सुखं परमधर्मिष्ठमत्यगाद्भरतर्षभ ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
सुखं पर्येति लोकांश्च मनश्चास्य प्रसीदति ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
सुखं पृष्ट्वा प्रतिवेद्यात्मसंस्थं; ततो दद्यादन्नमवेक्ष्य धीरः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९८
युधिष्ठिर उवाच
सुखं प्रतिविवुद्धानामिन्द्रिय़ाण्युपलक्षय़े |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
सुखं प्रविष्टौ शिविरं स्वमीश्वरौ; सदस्यहूताविव वासवाच्युतौ ||
६२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
सुखं प्रशान्तः स्वपिति हित्वा जय़पराजय़ौ ||
५९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
सुखं प्राप्तो भवान्कच्चित्किं वा मत्तश्चिकीर्षसि |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
सुखं प्राप्स्यति पाञ्चाली पाण्डवान्प्राप्य वै पतीन् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
सुखं मोक्षसुखं लोके न च लोकोऽवगच्छति |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
सुखं लोके विपर्येति मनश्चास्य प्रसीदति ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
सुखं वसति धर्मात्मा दिवि देवगणैः सह ||
५५ ग
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
सुखं वसति वीभत्सुरनुजस्यानुजस्तव ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
सुखं वा यदि वा दुःखं द्वेष्यं वा यदि वा प्रिय़म् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
सुखं वा यदि वा दुःखं द्वेष्यं वा यदि वा प्रिय़म् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
सुखं वा यदि वा दुःखं प्रिय़ं वा यदि वाप्रिय़म् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
सुखं वा यदि वा दुःखं भूतानां पर्युपस्थितम् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
सुखं वित्तं च भुञ्जीत वृत्तेनैतेन गोपय़ेत् |
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
सुखं वै व्राह्मणो व्रह्म स वै तेनाधिगच्छति ||
१६ ग
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
सुखं शक्रस्य भवने सर्वकामसमन्वितः ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
सुखं शुद्धित्वमारोग्यं सन्तोषः श्रद्दधानता ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
वृहस्पतिरु उवाच
सुखं शय़ेऽहं शय़ने महेन्द्र; तथा मनोज्ञाः परिचारका मे |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
सुखं स दुःखान्यवमुच्य शेते; जीर्णां त्वचं सर्प इवावमुच्य ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
सुखं सर्वं परित्यज्य रात्र्यहानि घटामि वै ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२३
द्रौपद्यु उवाच
सुखं सुखेनेह न जातु लभ्यं; दुःखेन साध्वी लभते सुखानि |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
सुखं स्वपन्तः कौरव्य पृथक्पृथगपाश्रय़ाः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
सुखं स्वपिति निर्विण्णो निराशश्चार्थसाधने ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
सुखं स्वपिहि गान्धारे श्वोऽस्मि कर्ता महारणम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
सुखं स्वर्गजितस्तत्र वर्तय़न्ति महामुने ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
८४
यय़ातिरु उवाच
सुखं हि जन्तुर्यदि वापि दुःखं; दैवाधीनं विन्दति नात्मशक्त्या |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८३
भृगुरु उवाच
सुखं ह्यनित्यं भूतानामिह लोके परत्र च ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
सुखं ह्यवमतः शेते योऽवमन्ता स नश्यति ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
सुखः साङ्ग्रामिको मृत्युः क्षत्रधर्मेण युध्यताम् |
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
सुखतन्त्रोऽर्थलाभेषु न चिरं महदश्नुते ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
सुखत्यागे तपोय़ोगः सर्वत्यागे समापना ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सुखदुःखगुणोदर्कं कालं कालफलप्रदम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
सुखदुःखफलं चैव न द्वेष्मि न च कामय़े ||
१३ ख