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स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये; जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये; नित्यो जीवो धातुरस्य त्वनित्यः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
नित्योच्छिष्टः सङ्कुसुको नेहाय़ुर्विन्दते महत् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
वासुदेव उवाच
नित्योत्थानेन सम्पन्ना नारदान्धकवृष्णय़ः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
नित्योत्थितो भूतय़ेऽतन्द्रितः स्या; देष स्मृतः शूद्रधर्मः पुराणः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती; नित्यस्वाध्याय़ी पतितान्नवर्जी |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
नित्योदको व्राह्मणः स्यान्नित्यशस्त्रश्च क्षत्रिय़ः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
नित्योद्युक्तेन वै राज्ञा भवितव्यं युधिष्ठिर |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
नित्योद्युक्तो दस्युवधे रणे कुर्यात्पराक्रमम् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
धृतराष्ट्र उवाच
नित्योद्विग्नमिदं सर्वं नित्योद्विग्नमिदं मनः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
नित्योद्विग्नाः प्रजा यस्य करभारप्रपीडिताः |
१०५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
नित्योद्विग्नो हि धनवान्मृत्योरास्यगतो यथा ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
नित्योपलेपनं धर्मस्तथा नित्योपवासिता |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
निदधाति निधिं श्रेष्ठं पारलौकिकमात्मनः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११३
नारद उवाच
निदर्शनं च तपसो भिक्षां श्लाघ्यां च कीर्तिताम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
निदर्शनं च प्रत्यक्षं व्राह्मणानां नराधिप |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
निदर्शनकरं लोके सज्जनाचरितं सदा ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
निदर्शनमिदं राजञ्शृणु मे भरतर्षभ |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
निदर्शनानि सूक्ष्माणि शृणु मे भरतर्षभ ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
निदर्शनान्युपाय़ांश्च वहून्युद्धर्षणानि च |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
च्यवन उवाच
निदर्शनार्थं तपसो धर्मस्य च नराधिप |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
निदर्शनार्थं न द्वेषात्तच्छ्रुत्वा क्षन्तुमर्हसि ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
निदर्शनार्थं सूक्ष्माणि वक्ष्यामि च पुनस्तव ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २८४
वैशम्पाय़न उवाच
निदर्शनैश्च वहुभिः कुण्डलेप्सुः पुरन्दरः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
निदर्शय़न्तौ त्वस्त्राणि दिव्यानि रणमूर्धनि |
७७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
निदाघकाले पानीय़ं तडागे यस्य तिष्ठति |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
निदाघकाले पानीय़ं यस्य तिष्ठत्यवारितम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
निदाघकाले वर्षे वा यश्छत्रं सम्प्रय़च्छति |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
निदाघवार्षिकौ मासौ लोकं घर्माम्वुभिर्यथा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
निदाघान्तकरः कालः सर्वभूतसुखावहः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
निदाघान्ते महाराज यथा मेघो दिवाकरम् ||
४९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
निदेशवर्ती च पितुः पुत्रो भवति धर्मतः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
निदेशवशवर्ती च भवन्तं शरणं गतः ||
६९ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
निदेशवाग्भिस्तत्ते ह विदितं भरतर्षभ ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
निदेशस्थाविमौ यस्य मानसस्तस्य सेत्स्यते |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
निदेशात्ते महाराज गतोऽसौ पुरुषर्षभः |
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
निदेशात्सूतपुत्रस्य सरथाः साश्वपत्तय़ः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
निदेशाद्धर्मराजस्य द्रष्टुं देवं पुरन्दरम् |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
निदेशाद्धर्मराजस्य द्रौपद्याः पदवीं चरन् |
४५ क
स्त्री पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
निदेशाद्भवतः पूर्वं वने विचरता मय़ा |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
निदेशे तव तिष्ठन्ति मय़ा सार्धं परन्तप ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
निदेशे धृतराष्ट्रस्य यः स्थास्यति स मे सुहृत् |
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
निदेशे यस्य राजानः सर्वे तिष्ठन्ति किङ्कराः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
निद्रा तन्द्री भय़ं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
निद्रा तन्द्रीरसम्प्रीतिरसूय़ा चानवेक्षिता |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
निद्रा सर्वात्मना त्याज्या स्वप्नदोषानवेक्षता ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
निद्रां च प्रतिभां चैव ज्ञानाभ्यासेन तत्त्ववित् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
निद्रां तन्द्रीं तथालस्यमावृत्य पुरुषान्स्थितान् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
निद्रां नैवोपलेभाते वासुदेवधनञ्जय़ौ ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
निद्रातन्द्री क्रोधहर्षौ क्षुत्पिपासे हिमातपौ |
९३ क