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उद्योग पर्व
अध्याय १४१
कर्ण उवाच
अथ वा सङ्गमः कृष्ण स्वर्गे नो भविता ध्रुवम् |
४६ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वा सर्व एवैते पाण्डवस्यानुय़ाय़िभिः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
अथ वा सर्वमेवेह जप्यकं मामकं फलम् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
अथ वा सशरीरास्ते गुणाः सर्वे शरीरिणाम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १४१
युधिष्ठिर उवाच
अथ वा सहदेवेन धौम्येन च सहाभिभो |
४ क
वन पर्व
अध्याय २२८
धृतराष्ट्र उवाच
अथ वा साय़ुधा वीरा मन्युनाभिपरिप्लुताः |
११ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
अथ वा सिद्धिरेव स्यान्महिमा तु तथैव ते |
४२ क
वन पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वा सुखदुःखेषु नृणां व्रह्मविदां वर |
६ क
वन पर्व
अध्याय २२८
धृतराष्ट्र उवाच
अथ वा सैनिकाः केचिदपकुर्युर्युधिष्ठिरे |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अथ वा स्थ प्रतिवलास्त्रातुं मां क्षत्रिय़र्षभाः |
६ क
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
अथ वा स्वय़मागच्छेत्परिधावन्नितस्ततः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
अथ वा हर्षकालोऽय़ं त्रैगर्तानामसंशय़म् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
अथ वाग्निं समाय़ाति सूर्यमाविशतेऽपि वा ||
११८ ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
अथ वानडुहे राजन्साधवे साधुवाहिने |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
करालजनक उवाच
अथ वानन्तरकृतं किञ्चिदेव निदर्शनम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ९८
नारद उवाच
अथ वान्यां दिशं भूमेर्गच्छाव यदि मन्यसे ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
अथ वापि स्वतन्त्रासि स्वदोषेणेह केनचित् |
६४ क
वन पर्व
अध्याय २२७
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वाप्यनुवुध्येत नृपोऽस्माकं चिकीर्षितम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
अथ वाप्यनय़ा गुर्व्या हेमविग्रहय़ा रणे |
४६ क
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
अथ वाप्यर्चनीय़ोऽय़ं युष्माकं मधुसूदनः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय १४२
अर्जुन उवाच
अथ वाप्यहमेवैनं हनिष्यामि वृकोदर |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अथ वाप्येक एवाहं योत्स्यामि कुरुनन्दन |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वाभ्यर्थनामिन्द्रः कुर्यान्न त्विह कामतः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अथ वामनकं गच्छेत्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ||
८६ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
अथ वारण्यनृपते नलं यदि न शंससि |
३३ क
वन पर्व
अध्याय १४४
भीमसेन उवाच
अथ वासौ मय़ा जातो विहगो मद्वलोपमः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
अथ वास्तं गते सूर्ये सन्ध्याकाल उपस्थिते |
४९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
अथ वास्मासु लीनेषु तिष्ठत्सु विषय़ेषु च |
२० क
वन पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
अथ वाय़ं सुमन्दात्मा वनं गच्छतु ते सुतः |
९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
अथ वाय़ुः समुद्भूतो दावाग्निरभवन्महान् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
अथ वाय़ुरपोवाह तद्रजस्तरसा वली |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
अथ विज्ञापय़ामास भूमिस्तं शरणार्थिनी |
४० क
वन पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
अथ विप्रोषितं वीरं पाञ्चाली मध्यमं पतिम् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
अथ विस्फार्य गाण्डीवं रणे नृत्यन्निवार्जुनः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
अथ वीरैर्जितां भूमिमखिलां प्रत्यपद्यथाः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
अथ वीरो महेष्वासो मत्तवारणविक्रमः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वृक्षमिमं मां वा भ्रातृन्वापि प्रपश्यसि ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
अथ वृक्षस्य शाखाय़ां विहङ्गः ससुहृज्जनः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
भीष्म उवाच
अथ वृत्रस्य कौरव्य दृष्ट्वा शक्रमुपस्थितम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
अथ वृत्रस्य कौरव्य शरीरादभिनिःसृता |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
अथ वेच्छति रागात्मा सर्वं तदधितिष्ठति |
१२५ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
अथ वेतसिकां गत्वा पितामहनिषेविताम् |
५० क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
अथ वेदीं समासाद्य नरः परमदुर्गमाम् |
४२ क
विराट पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वै धार्तराष्ट्रेण प्रय़ुक्ता ये वहिश्चराः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वै भगवान्व्रह्मा व्रह्मर्षिभिरुपस्थितः |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
अथ वैकर्तनं कर्णं रणे क्रुद्धमिवान्तकम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
अथ वैकोऽहमेकाहमेकैकस्मिन्वनस्पतौ |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वैप्राश्निकांस्तत्र पप्रच्छ जनमेजय़ ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २९
प्रह्लाद उवाच
अथ वैरोचने दोषानिमान्विद्ध्यक्षमावताम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
अथ वैवस्वतः कालो मृत्युश्च त्रितय़ं विभो |
२८ क