आदि पर्व
अध्याय
१४९
व्राह्मण उवाच
अभिसन्धिकृते तस्मिन्व्राह्मणस्य वधे मय़ा |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
अभिसन्धिपूर्वकं कर्म कर्ममूलं ततः फलम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अभिसन्धीय़ते प्राज्ञः प्रमादादपि चावुधैः ||
१९६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
अभिसम्पूज्य पूजार्हमृषिं याजमुवाच ह ||
२० ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
अभिसस्रुर्यथोद्देशं सवलाः सहवाहनाः ||
८३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
अभिसारस्तु तं राजा नवभिर्निशितैः शरैः |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिसारीं ततो रम्यां विजिग्ये कुरुनन्दनः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
अभिसारेण सर्वेण तत्र युद्धमवर्तत ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
अभिसार्यमाणमनिशं ददृशाते महार्णवम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
अभिसारय़ामास तदा वेगेन पतगेन्द्रवत् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
अभिसृत्य च राजानं विदिता सा प्रवेशिता |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
अभिसृत्य परीप्सार्थं ततस्ते धृतवर्मणः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
अभिसृत्य महाराज वेगवद्भिर्महागजैः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिहत्य च भूय़स्तावन्योन्यं वलदर्पितौ |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
अभिहत्य दृढं युद्धे तान्सर्वान्प्रत्यविध्यत ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अभिहत्य शरौघैस्तं शतशोऽथ सहस्रशः |
८० क
सभा पर्व
अध्याय
४६
दुर्योधन उवाच
अभिहत्य शिलां भूय़ो ललाटेनास्मि विक्षतः ||
३२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
अभिहत्यार्जुनश्चक्रे वाजिपानं सरः शुभम् ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९
सूत उवाच
अभिहन्ति यथासन्नं गृह्य प्रहरणं सदा ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
अभिहर्तुं नृपा जग्मुर्नान्यैः कार्यैः पृथक्पृथक् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
अभिहारय़त्सु शनकैर्भरतेषु युय़ुत्सुषु |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
अभिय़ाति द्रुतं कर्णं तद्वारय़ महारथम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
अभिय़ात्येष वीभत्सुः सूतपुत्रजिघांसय़ा ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
अभिय़ात्वा तथैवाशु रथस्थान्सूर्यवर्चसः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
अभिय़ानं तु वीरेण प्रद्युम्नेन महाहवे |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
अभिय़ानीय़माज्ञाय़ वैराटिरिदमव्रवीत् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
युधिष्ठिर उवाच
अभिय़ाने च युद्धे च राजा हन्ति महाजनम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
अभिय़ाने तु पार्थस्य नरैर्नगरवासिभिः |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
अभिय़ाने मतिं चक्रे द्रुपदं प्रति भारत ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
अभिय़ासि जवेनैव समीक्ष्य त्रिविधं वलम् ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
अभिय़ासि महावाहो भीमसेनं महावलम् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
अभिय़ास्यति मां कोपात्सम्वन्धी सुमहावलः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
अभिय़ास्यति मां पार्थः शक्रशक्त्या विनाकृतम् ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
अभिय़ास्यति मां पार्थस्तन्मे साधु भविष्यति |
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
अभिय़ास्यति सङ्क्रुद्धो दशार्णाधिपतिर्हि तम् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अभिय़ाय़ च दुर्धर्षां धार्तराष्ट्रस्य वाहिनीम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अभिय़ाय़ महेष्वासा विव्यधुर्निशितैः शरैः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
अभिय़ुक्तं वलवता दुर्वलं हीनसाधनम् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
अभिय़ुक्तस्तु को राजा दातुमिच्छेद्धि मेदिनीम् ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अभिय़ुक्तोऽप्रमत्तश्च प्राग्भय़ाद्भीतवच्चरेत् ||
१९९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
अभीक्ष्णं कम्पते भूमिरर्कं राहुस्तथाग्रसत् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अभीक्ष्णं क्रूरवादिन्यः परुषा रुदितप्रिय़ाः |
७७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
कुन्त्यु उवाच
अभीक्ष्णं गर्भिणी श्रुत्वा ध्रुवं वीरं प्रजाय़ते ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
अभीक्ष्णं दृश्यसे भीम सर्वं तन्मन्युकारितम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
अभीक्ष्णं भिक्षुदोषेण राजानं घ्नन्ति तादृशाः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
अभीक्ष्णं वध्यमानास्ते दानवा ये समागताः ||
४८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
अभीक्ष्णदर्शनाद्गावः स्त्रिय़ो रक्ष्याः कुचेलतः ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
अभीक्ष्णदृष्टोऽसि पुरा हि नस्त्वं; धनञ्जय़स्यात्मसमः सखासि ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
अभीक्ष्णमनुगृह्णासि धनधान्येन दुर्गतान् ||
६१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
अभीतः पूरय़ञ्शक्तिं स वै पुरुष उच्यते ||
३ ख