chevron_left  अग्नेरंशंarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
अग्नेरंशं तु विद्धि त्वं धृष्टद्युम्नं महारथम् |
८७ क
आदि पर्व
अध्याय ६
सूत उवाच
अग्नेरथ वचः श्रुत्वा तद्रक्षः प्रजहार ताम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
अग्नेरपत्यमेतद्वै सुवर्णमिति धारणा ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
अग्नेरावेदय़ञ्शापं क्रिय़ासंहारमेव च ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अग्नेरिव महाकक्षे शव्दः समभवन्महान् ||
४२ ख
विराट पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
अग्नेरीशस्य सोमस्य वरुणस्य प्रजापतेः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
अग्नेर्जागर्ति वरुणो वरुणाच्च प्रजापतिः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४७
भीष्म उवाच
अग्नेर्दुर्धर्षता तेजस्तापः पाकः प्रकाशनम् |
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३९
व्यास उवाच
अग्नेर्भागं शुभं विद्धि राक्षसं तु शिखण्डिनम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
अग्नेर्भूमेरपां वाय़ोरन्तरिक्षस्य चाभिभो |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
अग्नेर्भूमेरपां वाय़ोरन्तरिक्षस्य चैव ह |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भरद्वाज उवाच
अग्नेर्यथा तथा तस्य यदि नाशो न विद्यते |
३ क
आदि पर्व
अध्याय २२५
मन्दपाल उवाच
अग्नेर्वचनमाज्ञाय़ मातुर्धर्मज्ञतां च वः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
अग्नेर्वाय़ुसहाय़स्य गतिः कक्ष इवाहवे |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
अग्नेर्वाय़ुसहाय़स्य यथा कक्षं दिधक्षतः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १३०
लोमश उवाच
अग्नेश्चात्रैव संवादः काश्यपस्य च भारत ||
११ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
अग्नौ जुहोमि भगवन्प्रतिगृह्णीष्व मां वलिम् ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय ७४
वृहदश्व उवाच
अग्नौ पाणिगृहीतां च हंसानां वचने स्थिताम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
अग्नौ प्रक्षिप्य पुरुषं ज्ञातय़ः सुहृदस्तथा ||
७३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
भीष्म उवाच
अग्नौ प्रक्षिप्यतामेष च्छिद्यतां खण्डशोऽपि वा |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
अग्नौ प्राप्तं प्रधूय़ेत यथा तूलं द्विजोत्तम |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
अग्नौ प्रास्तं तु पुरुषं कर्मान्वेति स्वय़ङ्कृतम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
अग्नौ प्रास्ताहुतिर्व्रह्मन्नादित्यमुपतिष्ठति |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
वाय़ुरु उवाच
अग्नौ वाससि सूर्ये च सुखं शीतेऽधिगच्छति ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
अग्न्यभावे च कुर्वन्ति वह्निस्थानेषु काञ्चनम् |
५५ क
वन पर्व
अध्याय १३८
शूद्र उवाच
अग्न्यागारं प्रति द्वारि मय़ा दोर्भ्यां निवारितः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
अग्न्यागारैश्च वहुभिः पुष्पसंस्तरसंस्तृतम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
अग्न्याधेय़ानि गुर्वर्थान्क्रतून्सपशुदक्षिणान् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
अग्न्याधेय़े यद्भवति यच्च सोमे सुते द्विज |
३७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
नारद उवाच
अग्नय़ः कारय़ित्वेष्टिमुत्सृष्टा इति नः श्रुतम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
अग्नय़ः सहदेवेन ये चिता यमुनामनु |
६ क
विराट पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
अग्नय़श्च न भासन्ते समिद्धास्तन्न शोभनम् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
अग्नय़श्चापि हूय़न्तां दाशार्णप्रतिषेधने ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्नय़ो मांसकामाश्च इत्यपि श्रूय़ते श्रुतिः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
अग्र एव महाभूतमाशु व्यक्तात्मकं मनः ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
अग्रगं धार्तराष्ट्राणां सर्वेषां शर्म वर्म च |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
अग्रजं सर्वभूतानां सङ्कर्षणमकल्पय़त् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १०४
वैशम्पाय़न उवाच
अग्रजातेति तां कन्यामग्र्यानुग्रहकाङ्क्षिणे |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान्न्याय़ो नेता समीरणः |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
अग्रणीर्यः कृतः पूर्वं वर्णावरपरिग्रहः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्रतः पादुके कृत्वा ददर्शासीनमासने ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
अग्रतः पुण्डरीकाक्षं प्रतीय़ाय़ नराधिप ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
अग्रतः पुरुषानीकमसिचर्मवतां भवेत् |
४० क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्रतः पृष्ठतश्चैव न हि तस्य गतिर्ध्रुवा ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
अग्रतः सर्वसैन्यानां प्रय़युः पाण्डवान्प्रति ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
अग्रतः सर्वसैन्यानां भीष्मः शान्तनवो यय़ौ |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
अग्रतः सर्वसैन्यानां यत्र शान्तनवोऽग्रणीः ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अग्रतः सर्वसैन्यानां योत्स्यमानो व्यवस्थितः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
अग्रतः सर्वसैन्यानां व्यूहस्य प्रमुखे स्थिताः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
अग्रतः सर्वसैन्यानां स्थिता व्यूहस्य दंशिताः ||
३४ ग