chevron_left  अनुज्ञातास्तय़ाarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातास्तय़ा सर्वे न्यवर्तन्त जनाधिपाः ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
अनुज्ञातास्मि भीष्मेण शाल्वमुद्दिश्य कारणम् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
अनुज्ञातुं च कर्णस्य वधाय़ाद्य दुरात्मनः ||
२३ ग
आदि पर्व
अध्याय १९६
द्रोण उवाच
अनुज्ञातेषु वीरेषु वलं गच्छतु शोभनम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
अनुज्ञातो गतस्तत्र शृङ्गी शुश्राव तं तदा |
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
अनुज्ञातो गुरुणा संनिवृत्य; शशास गामखिलां सागरान्ताम् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय १३४
लोमश उवाच
अनुज्ञातो जनकेनाथ राज्ञा; विवेश तोय़ं सागरस्योत वन्दी ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातो धर्मराज्ञा पुत्रं सस्मार राक्षसम् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातो निववृते कृष्णं कृत्वा प्रदक्षिणम् ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातो निववृते परिष्वज्य जनार्दनम् ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
अनुज्ञातो निववृते पुनरेव यथागतम् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
गालव उवाच
अनुज्ञातो भगवता गृहं गत्वा युधिष्ठिर |
४२ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
अनुज्ञातो भगवता त्र्यम्वकेन शचीपतिः ||
७७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
नारद उवाच
अनुज्ञातो मय़ा वत्स यथेष्टं गच्छ गालव ||
१९ ग
मौसल पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
अनुज्ञातो यय़ौ पार्थो नगरं नागसाह्वय़म् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
अनुज्ञातो रथवेगावधूतः; श्रान्तो निपद्ये शय़नं नृसिंह |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
अनुज्ञातौ क्षणे तस्मिन्भवेनार्जुनकेशवौ |
८१ क
वन पर्व
अध्याय ९६
लोमश उवाच
अनुज्ञाप्य च पप्रच्छ प्रय़ोजनमुपक्रमे ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञाप्य महात्मानं तत्रैवान्तरधीय़त ||
११३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञाप्य मुनीन्सर्वान्स्पृष्ट्वा तोय़ं च भारत |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
अनुज्ञाप्य मृगेन्द्रं तु गोमाय़ुर्नीतिशास्त्रवित् |
६९ क
वन पर्व
अध्याय २२७
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञास्यति नो राजा चोदय़िष्यति चाप्युत ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञाय़ च कौन्तेय़ं तत्रैवान्तरधीय़त ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
कपिल उवाच
अनुज्ञाय़ च तत्सर्वमन्यद्रोचय़तेऽफलम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४
सुद्युम्न उवाच
अनुज्ञाय़ामपि तथा हेतुः स्याद्व्राह्मणर्षभ ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
अनुज्ञय़ा चाथ महाव्रतस्य; व्रूय़ान्नृपो यद्विदुरस्तथैव |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्येष्ठं च ते तत्र युधिष्ठिरपुरोगमाः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
जनमेजय़ उवाच
अनुतप्ये च पापेन न चाधर्मं चराम्यहम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १९८
मार्कण्डेय़ उवाच
अनुतप्ये भृशं तात तव घोरेण कर्मणा ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
अनुतर्षुल एवार्थः स्वादु गाङ्गमिवोदकम् |
२८ क
स्त्री पर्व
अध्याय ७
विदुर उवाच
अनुतर्षुलमेवैतद्दुःखं भवति भारत |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
अनुतिष्ठ त्वमेनं वै पूर्वैर्दृष्टं सनातनम् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
अनुतिष्ठ प्रतिज्ञां तां सत्यवाग्भव तैः सह ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
अनुतिष्ठ महाप्राज्ञ कृष्णभीष्मौ यदूचतुः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
अनुतिष्ठन्ति चैवार्थानाचक्षाणाः परस्परम् ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
अनुतिष्ठन्ति पूर्वाह्णे नित्यमाय़व्ययं तव ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
अनुतिष्ठस्व वै राजन्पितृपैतामहं पदम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
अनुतिष्ठेत्स्वय़ं राजा सर्वं ह्यत्र प्रतिष्ठितम् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २९५
वैशम्पाय़न उवाच
अनुत्तराः सर्वभूतेषु भूय़ः; सम्प्राप्ताः स्मः संशय़ं केन राजन् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
कपिल उवाच
अनुत्तरीय़वसनमनुपस्तीर्णशाय़िनम् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
अनुत्थानभय़े चोभे निरीहो नाश्नुते महत् ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
अनुत्थानवता चापि मोघं तस्य प्रजाफलम् ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २१
व्राह्मण उवाच
अनुत्पन्नेषु वाक्येषु चोद्यमाना सिसृक्षय़ा |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
युधिष्ठिर उवाच
अनुदर्शितं भगवता यथा धर्मोऽनुगच्छति |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
अनुदर्शितरूपोऽसि पश्यामि कुरु पौरुषम् |
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
अनुदर्शय़ां ततश्चक्रे प्रत्यगृह्णान्न चाप्यसौ ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
अनुदुष्येय़ुरपरे पश्यन्तस्तव पौरुषम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
अनुद्यतं रोगिणं याचमानं; न वै हिंस्याद्वालवृद्धौ च राजन् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३९
व्रह्मो उवाच
अनुद्रिक्तमनूनं च ह्यकम्पमचलं ध्रुवम् |
२३ क