chevron_left  अभ्ययात्सौवलःarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
अभ्ययात्सौवलः क्रुद्धस्तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
अभ्ययादप्रमेय़ात्मा विजय़स्तव वाहिनीम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
अभ्ययाद्भरतश्रेष्ठ धर्मराजजिघृक्षय़ा ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
अभ्ययाद्रभसं युद्धे वेगमास्थाय़ मध्यमम् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
अभ्ययाद्वर्जय़न्द्रोणं मैनाकमिव पर्वतम् ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्ययाद्विसृजन्वाणान्काय़ावरणभेदिनः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
अभ्ययान्मेघघोषेण रथेनादित्यवर्चसा ||
५२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
अभ्ययुः कौरवा राजन्पाण्डवानामनीकिनीम् ||
१७ ग
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
अभ्ययुः कौरवान्सर्वान्योत्स्यमानाः समन्ततः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
अभ्ययुः पाण्डवं युद्धे विसृजन्तः शिताञ्शरान् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
अभ्ययुः समरे राजंस्ततो युद्धमवर्तत ||
४४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्ययुः सहदाशार्हाः शिविरं पुनरेव ह ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्ययुः सहिताः पार्थं प्रगृहीतशरासनाः ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्ययुर्भ्रातरः सर्वे गान्धारीं सहकेशवाः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्ययुर्व्राह्मणाः सर्वे समुच्छ्रितकुशध्वजाः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अभ्यरक्षत संहृष्टः सौवलेय़स्य वाहिनीम् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
अभ्यरक्षन्त सहिता राक्षसेन्द्रं घटोत्कचम् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
अभ्यर्चितौ तदा वीरौ प्रीत्या चाभ्यधिकं ततः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
अभ्यर्च्य देवतास्तत्र नमस्कृत्य मुनींस्तथा |
५९ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
अभ्यर्च्य विविधै रत्नैः प्रीतिय़ुक्तौ मुदा युतौ |
६७ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्यर्च्य व्राह्मणान्पार्थो द्रौपदीमभिजग्मिवान् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३६
शम्वर उवाच
अभ्यर्च्याननुपृच्छामि पादौ गृह्णामि धीमताम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्यर्चय़ामास तदा सर्वकामैः प्रय़त्नवान् ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय २८६
सूर्य उवाच
अभ्यर्थय़ेथा देवेशममोघार्थं पुरन्दरम् ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
अभ्यर्दितस्तु तैर्जिष्णुः शक्रतुल्यपराक्रमः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
अभ्यर्दय़ञ्जिघांसन्तः पत्तय़ः कर्णमाहवे ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
अभ्यर्दय़दमेय़ात्मा पार्ष्णिग्रहणकारणात् |
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
अभ्यर्दय़न्महेष्वासं सूतपुत्रं महामृधे ||
७२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत कर्णस्तमर्दितोऽपि शरैर्भृशम् ||
४३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत तत्सैन्यं हृष्टरूपः परन्तपः ||
५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत तान्सर्वान्सौवलान्वलदर्पितः ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत द्रोणस्य रथं रुक्मविभूषितम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत पुत्रस्ते पाण्डवानामनीकिनीम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत युद्धाय़ द्रावय़न्सर्वधन्विनः |
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत राधेय़ो भीमसेनं महावलम् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत राधेय़ो भीमसेनरथं प्रति ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत वेगेन कालवत्पाण्डुवाहिनीम् ||
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत वेगेन तव पुत्रस्य वाहिनीम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत वेगेन यत्र पार्थो वृकोदरः ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत वेगेन सिंहः क्षुद्रमृगानिव ||
७२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत वै कर्णं क्रोधदीप्तो वृकोदरः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत संहृष्टस्ततो युद्धमवर्तत ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत सङ्क्रुद्धः पाण्डूनां सुमहद्वलम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत सङ्क्रुद्धः शिवी राजन्प्रतापवान् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत सङ्ग्रामे क्रुद्धो द्रोणरथं प्रति ||
४३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत सङ्ग्रामे भारद्वाजं युय़ुत्सय़ा ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तत सम्प्रेप्सुः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तन्त कौरव्याः पाण्डवाश्च तमन्वय़ुः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तन्त तौ वीरौ छादय़न्तो महारथाः ||
९४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तन्त तौ वीरौ नर्दमानौ मुहुर्मुहुः ||
१० ख