शान्ति पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
अन्तरा विलय़ं यान्ति यथा पथि विचक्षुषः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
अन्तरा साय़माशं च प्रातराशं तथैव च |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तराग्निः श्रितो यो हि भुक्तं पचति देहिनाम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
अन्तराणां च भेदार्थं चारानभ्यवचारय़ेत् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४४
व्यास उवाच
अन्तरात्मकमाकाशं तन्मय़ं श्रोत्रमिन्द्रिय़म् |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
अन्तरात्मनि विनिहिते; रौषि पत्ररथ वितथम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
अन्तरात्मनि संलीय़ मनःषष्ठानि मेधय़ा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
अन्तरात्मा तथा देहमाविश्येन्द्रिय़रश्मिभिः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
अन्तरात्मेति चाप्येते निय़ताः पञ्च वाय़वः |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
अन्तरात्मेव भूतानां तत्क्षय़े वै वलक्षय़ः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
अन्तरिक्षं च सहसा वाणभूतमभूत्तदा ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
अन्तरिक्षं दिशश्चैव सर्वाश्च प्रदिशस्तथा ||
३ ग
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
अन्तरिक्षगता देवाः साधु साध्वित्यपूजय़न् |
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
अन्तरिक्षचरः कोऽय़ं तपसा सिद्धिमागतः |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरिक्षचरः श्रीमान्कलशं गृह्य देवलः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
अन्तरिक्षचरः श्रीमान्व्यासपुत्रः सुनिश्चितः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
अन्तरिक्षचरः श्रीमान्समग्रवलवाहनः ||
६ ग
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरिक्षचरा घोरा महाकाय़ा महावलाः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरिक्षचरा ह्यस्मि कामतो विचरामि च |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
अन्तरिक्षचराः सर्वे सर्वेऽभिमुखय़ोधिनः |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
अन्तरिक्षचराणां च दानवोत्तम पक्षिणाम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरिक्षचराणां च भूमिष्ठानां च गर्जताम् |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
अन्तरिक्षसवर्णास्तु तारकाचित्रिता इव |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अन्तरिक्षस्य विषय़े प्रजा इव चतुर्विधाः ||
२३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
अन्तरिक्षाच्च कौरव्य दण्डः कृष्णाजिनं च ह |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
अन्तरिक्षाज्जलं मूर्ध्ना प्रत्यगृह्णान्मुहुर्मुहुः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
अन्तरिक्षादन्यतरं धारणासक्तमानसम् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
अन्तरिक्षान्महाराज न्यपतन्त सहस्रशः ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरिक्षे च वागासीत्साधु केशव साध्विति ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अन्तरिक्षे च शुश्राव दिव्यां वाचं समन्ततः ||
८७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
अन्तरिक्षे महानादः श्रूय़ते भरतर्षभ ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
अन्तरिक्षे महाराज विनदन्तोऽवतस्थिरे ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरिक्षे वराहस्य वृषदंशस्य चोभय़ोः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तरिक्षे विमानानि देवतानां युधिष्ठिर |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरिक्षे व्यराजन्त खद्योताः प्रावृषीव हि ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
अन्तरिक्षे स्थितो ह्यस्मि तैर्विप्रैर्वान्धवैरिव |
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरिक्षे हि शुश्राव तिष्ठेति स वचस्तदा ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरिक्षेऽन्तरिक्षस्थः पवनः सर्वगस्तथा ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरीय़ोत्तरीय़ाणि भूषणानि च सर्वशः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अन्तरे चैव सम्प्राप्ते कलिद्वापरय़ोरभूत् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अन्तरेण कलिङ्गानां पाण्डवानां च वाहिनीम् |
९५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
अन्तरेण मय़ाज्ञप्तश्चिरकारी ह्युदारधीः |
५० क
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरेण यकृल्लोमाञ्शूरसेनांश्च पाण्डवाः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
अन्तरेण वधात्पार्थ सानुवन्धः सुय़ोधनः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
अन्तरेण हतावेतौ छलेन च विशेषतः |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरेणापि कौन्तेय़ निकृतिं पापनिश्चय़म् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
अन्तरेभ्यः परान्रक्षन्परेभ्यः पुनरन्तरान् |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
अन्तरेष्ववतिष्ठन्ति गिरीणामपि दारणाः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
अन्तरैरभिसन्धाय़ राजन्सिध्यन्ति नान्यथा ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
अन्तरैर्भेदय़ित्वारीन्विल्वं विल्वेन शातय़ |
१० ख