भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
दारुणः क्षत्रधर्मोऽय़मृषिभिः सम्प्रदर्शितः |
६० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
दारुणश्च पुनस्तत्र प्रादुरासीत्समागमः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
दारुणान्यपि भूतानि सान्त्वेनाराधय़ेद्यथा ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
दारुणाभिरुता घोरा क्ष्वेडितोत्क्रुष्टनादिता ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
वृहदश्व उवाच
दारुणामटवीं प्राप्य भर्तृव्यसनकर्शिता ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
दारुणेषु च सर्वेषु प्रत्यहं च विवर्जय़ेत् |
१२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
दारुणैकाय़ने काले कथं वा प्रतिपेदिरे ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
दारुणो दारुणस्पर्शः कर्णस्याभ्याशमागमत् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
दारुणो मर्त्यलोकोऽय़ं सर्वप्राणिविनाशनः |
८० क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
दारुणो ह्येष दुष्टात्मा क्षुद्रकर्मा निशाचरः |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
दारुणोत्पातसञ्चारो नभसः स्तनय़ित्नुमान् |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
दारेषु चास्मदीय़ेषु पौरजानपदेषु च ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
दारेष्वतिप्रसक्तश्च यक्ष्माणं समपद्यत ||
२३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
दारोश्चूर्णमिवाश्मसारविहितं कर्मान्तिकं प्रापय़ेत् ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
दार्यते भगदत्तेन यत्र पाण्डववाहिनी ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
दार्यमाणां चमूं दृष्ट्वा भगदत्तेन मारिष |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
दार्वाघाटमुखाश्चैव चाषवक्त्राश्च भारत |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
दार्वाभिसारा दरदाः पुण्ड्राश्च सह वाह्लिकैः ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
दार्वाभिसारा दरदाः शका रमठतङ्गणाः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
दारय़न्ती धरां देवीं कम्पय़न्तीव पर्वतान् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
दारय़न्निव पद्भ्यां स जगतीं जगतीश्वरः ||
५४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
दारय़न्पृथिवीन्द्राणां मनः शव्देन भारत ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
दारय़न्वहुधा सैन्यं रणे चरति कालवत् |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
दारय़न्सर्वसैन्यानि धार्तराष्ट्राणि सर्वशः ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
दारय़ामास समरे शतशोऽथ सहस्रशः ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
दारय़ेत गिरीन्सर्वाञ्शोषय़ेत च सागरान् ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
दारय़ेतां सुसङ्क्रुद्धावन्योन्यमपराजितौ ||
७६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
दारय़ेद्यन्महीं कृत्स्नां शोषय़ेद्वा महोदधिम् |
१३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
दारय़ेय़ं महीं क्रुद्धो विकिरेय़ं च पर्वतान् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
दारय़ेय़ं महीं क्रोधाद्विकिरेय़ं च पर्वतान् ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
दारय़ोर्यस्य चान्येन मिषतः प्राज्ञमानिनः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
दावं दग्ध्वा यथा शान्तं पावकं शिशिरात्यये ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
दावाग्निधूमसदृशं चक्रतुः पार्थिवं रजः ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
दावाग्निना समाय़ुक्ते स च राजा पिता तव ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
दावाग्निविप्रमुक्तेषु शून्येषु गहनेषु च ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
दावाग्न्यभिपरीतानां भूरिगुल्मतृणद्रुमे |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
देवव्रत उवाच
दाशराज निवोधेदं वचनं मे नृपोत्तम |
८६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
दाशार्णकस्य नृपतेस्तनूजां; शिखण्डिने वरय़ामास दारान् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
दाशार्णकाः प्रय़ागाश्च दाशेरकगणैः सह |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
दाशार्हं पुण्डरीकाक्षमुवाच प्राञ्जलिः शुचिः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
दाशार्हाः परिवारास्ते दाशार्णाश्च विशां पते ||
२३ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
दाशार्हीपुत्रजं वीरं शय़ानं सत्यविक्रमम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
दाशार्हेणाभ्यनुज्ञातस्तत्र धौम्यः पुरोहितः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
दाशार्हय़ोधैस्तु ससादिय़ोधं; प्रतीक्षतां नागपुरं भवन्तम् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
दाशीशतं च कल्याणीमुपतस्थुर्वशानुगाः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
दासकर्मकरान्भृत्यानाचार्यर्त्विक्पुरोहितान् |
१७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
दासभार्यासि पाञ्चालि क्षिप्रं प्रविश नो गृहान् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
दासभार्येति पाञ्चालीमव्रवीत्कुरुसंसदि ||
७९ ख
वन पर्व
अध्याय
२५६
भीमसेन उवाच
दासभावं गतो ह्येष पाण्डूनां पापचेतनः ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
६३
कर्ण उवाच
दासस्य पत्नी त्वं धनमस्य भद्रे; हीनेश्वरा दासधनं च दासी ||
१ ख