chevron_left  अभ्यासमकरोद्धर्मेarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
अभ्यासमकरोद्धर्मे ततस्तुष्टास्य देवताः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १९२
विष्णुरु उवाच
अभ्यासश्च भवेद्भक्त्या त्वय़ि नित्यं महेश्वर ||
२४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
अभ्यासात्स तथा युक्तो न गच्छेत्प्रकृतिं पुनः ||
१४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
अभ्यासेन तु कौन्तेय़ वैराग्येण च गृह्यते ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३४
श्रीभगवानु उवाच
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ३४
श्रीभगवानु उवाच
अभ्यासय़ोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय़ ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
अभ्यासय़ोगय़ुक्तेन चेतसा नान्यगामिना |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अभ्याहतानां कर्णेन पाञ्चालानां महारणे |
९४ क
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्याहनदमेय़ात्मा भीष्मं शान्तनवं रणे ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्याय़युर्वेदविदः पुराणा; स्तान्पूजय़ामासुरथो नराग्र्याः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
अभ्याय़युश्च तं देशं निश्चिता जालकर्मणि ||
१२ ग
वन पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्याय़युस्ते वदरीं विशालां; सुखेन वीराः पुनरेव वासम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
अभ्याय़यौ भीमसेनं निहन्तुं; समुद्यतास्त्रः सुरराजकल्पः ||
३२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
अभ्युच्छ्रय़श्च रोम्णां वै विक्रिय़ाश्च परन्तप ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
अभ्युज्जीवेत्सीदमानः समर्थो धर्ममाचरेत् ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अभ्युत्तिष्ठ श्रुतादस्माद्भूय़स्त्वं रञ्जय़न्प्रजाः ||
२०७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
अभ्युत्थानेन दैवस्य समारव्धेन कर्मणा |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
युधिष्ठिर उवाच
अभ्युत्थिते दस्युवले क्षत्रार्थे वर्णसङ्करे |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
अभ्युत्पतँल्लोकगुरुर्वभासे; भूतानि धक्ष्यन्निव कालवह्निः ||
९२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्युत्स्मय़ित्वा राधेय़ं भीममाधर्षय़न्निव |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्युद्गतास्त्वां वय़मद्य सर्वे; तत्त्वं पाते तव जिज्ञासमानाः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०६
मुनिरु उवाच
अभ्युद्धरति चात्मानं प्रसादय़ति च प्रजाः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
अभ्युद्ययावुद्यतवाणपाणिः; कक्षं दिधक्षन्निव धूमकेतुः ||
१०६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
अभ्युद्ययुस्ते शितशस्त्रहस्ता; रिरक्षिषन्तो रथमर्जुनस्य ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
अभ्युद्ययू रणे पार्थान्भीष्मं कृत्वाग्रतो नृप ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
अभ्युद्ययौ सम्प्रहृष्टो हृष्टरूपं परन्तप ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्युपेत्य महाप्राज्ञः कृष्णद्वैपाय़नोऽव्रवीत् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
अभ्येति व्रह्म सोऽत्यन्तं न तं शोचन्ति पण्डिताः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ७२
दमय़न्त्यु उवाच
अभ्येत्य कुशलं भद्रे मृदुपूर्वं समाहिता |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
अभ्येत्य च महावाहुः स्मय़मानः स राक्षसः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय २९८
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्येत्य चाश्रमं वीराः सर्व एव गतक्लमाः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्येत्य तेषां वेश्मानि पुनराय़ात्सहैव तैः ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
धृतराष्ट्र उवाच
अभ्येत्य त्वां तात वदामि सञ्जय़; अजातशत्रुं च सुखेन पार्थम् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
अभ्येत्य पादय़ोस्तस्य निपपात महाद्युतिः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
अभ्येत्य पुत्रेण तवाभिनन्दितः; समेत्य चोवाच कुरुप्रवीरान् |
५१ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्येत्य राजा कौन्तेय़ो निवासमकरोत्प्रभुः ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्येत्य राजानममित्रहाव्रवी; ज्जय़ोऽस्तु ते पार्थिव भद्रमस्तु च |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ५२
ऋषय़ ऊचुः
अभ्येत्य शक्रस्त्रिदिवात्पर्यपृच्छत कारणम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
अभ्येत्य सर्वे किष्किन्धां तस्थुर्युद्धाभिकाङ्क्षिणः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
अभ्येत्य सहसा कर्णं द्रोणं च जय़तां वरम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय २५६
भीमसेन उवाच
अभ्येत्याश्रममध्यस्थमभ्यगच्छद्युधिष्ठिरम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
अभ्रच्छाय़ामिव शरैः सैन्ये कृत्वा धनञ्जय़ः |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
अभ्रच्छाय़ेव चैवासीद्ध्वाङ्क्षगृध्रवडैर्युधि ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
अभ्रच्छाय़ेव तत्रासीच्छरवृष्टिभिरम्वरे |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
अभ्रच्छाय़ेव सञ्जज्ञे वाणरुद्धे नभस्तले ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
अभ्रच्छाय़ेव सञ्जज्ञे शरैर्मुक्तैर्महात्मभिः ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
अभ्रच्छाय़ेव सञ्जज्ञे सम्पतद्भिः शरोत्तमैः ||
८३ ख