chevron_left  व्यपेतभय़मन्युश्चarrow_drop_down
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
व्यपेतभय़मन्युश्च कामहा मुच्यते नरः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
व्यपेतभय़संमोहः शैलमभ्यपतद्वली ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
व्यपेतभय़संमोहः शैलमभ्यपतद्वली ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
व्यपेतभय़संमोहः शैलराजं समाविशत् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
व्यपेतभय़संमोहाः पश्यन्तु सुहृदस्तव ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
व्यपेतमन्युर्व्यपनीतपाप्मा; विहृत्य यत्रेच्छसि तत्र कामम् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
व्यपेतहृदय़त्रास आपद्धर्मातिगो रथः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
व्यपेताभ्रघने काले द्यौरिवाव्यक्तशारदी ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४
नारद उवाच
व्यपेय़ुस्ते रणं हित्वा राजानो भग्नमानसाः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
व्यपोढाभ्रघनः कालः क्षणेन समपद्यत |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
व्यपोढे च ततो घोरे तस्मिंस्तेजसि भारत |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
व्यपोथय़त सङ्ग्रामे क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
व्यपोथय़द्दन्तिवरेण शुष्मिणा; सशव्दवत्स्थूलनडान्यथा तथा ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
व्यपोवाह शरांस्तस्य सर्वानेव धनञ्जय़ः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७०
भीष्म उवाच
व्यपोहति तदा व्रह्म प्रकाशेत सनातनम् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
व्यपोहति तमस्तीव्रं तथा शत्रून्व्यपोह नः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
व्यपय़ातेषु दैत्येषु प्रादुर्भूते च दर्शने |
४ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
व्यपय़ातेषु पार्थेषु त्रय़स्तेऽभ्याय़यू रथाः |
१७९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
व्यपय़ातेषु सैन्येषु वासाय़ भरतर्षभ |
२ क
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
व्यपय़ानं रणात्सौते जीवतो मम कर्हिचित् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
व्यभजंश्चापि संरम्भाद्दुःखवासं तथावसन् ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय ११७
अकृतव्रण उवाच
व्यभजंस्तेन ते राजन्प्रख्याताः खाण्डवाय़नाः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
व्यभजत्तान्यनीकानि दश चैकं च भारत ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
व्यभजत्पृथिवीं कृत्स्नां यय़ातिर्नहुषात्मजः ||
९० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
व्यभजन्त द्विजातिभ्यो यथोत्साहं यथावलम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
व्यभिचारात्तु सा तस्मात्क्लिन्नाम्भसि विचेतना |
८ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
व्यभिचारान्नरेन्द्राणां धर्मः सङ्कीर्यते महान् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
व्यभिचारे तु कस्मिंश्चिद्व्यतिक्रम्यापरान्सुतान् |
७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
व्यभ्रमच्चापि संविग्नं दिवि नक्षत्रमण्डलम् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
व्यभ्रमत्तत्र तत्रैव क्षोभ्यमाण इवार्णवः ||
७० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
व्यभ्राजत भृशं राजन्पुत्रस्तव विशां पते |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
व्यभ्राजत महाराज पुण्डरीकैरिवावृता ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
व्यभ्राजत रणे राजन्विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
व्यभ्राजत श्रिय़ा जुष्टो यथा शक्रस्त्रिविष्टपे ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
व्यभ्राजत सभामध्ये हेम्नीवोपहितो मणिः ||
५२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
व्यभ्राजेतां ततस्तौ तु संय़ुगे शरविक्षतौ |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
व्यभ्राजेतां महाराज पुष्पिताविव किंशुकौ ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
व्यभ्राजेतां महाराज श्वाविधौ शललैरिव ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
व्यभ्राजेतां यथा मेघं सूर्याग्नी सहितौ दिवि ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
व्यभ्राजेतां यथा वारिप्रस्रुतौ गैरिकाचलौ ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
व्यभ्राम्यत महाराज भिन्ना नौरिव सागरे ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
व्यमुह्यन्त रणे तत्र तमसा संवृते सति ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
व्यमृद्नात्समरे राजंस्तुरगांश्च नरान्रणे |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
व्यमोहय़त राजानं धरणीं च जगाम ह ||
२७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
व्ययोजय़त खड्गेन प्राणैर्द्विजवरो नरान् ||
१०५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
व्ययोजय़न्त पाञ्चालान्प्राणैः प्राणभृतां वर ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
व्यराजञ्शाखिनस्तत्र सूर्यांशुप्रतिरञ्जिताः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
व्यराजत महाराज त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
व्यराजत मही राजन्वीताभ्रा द्यौरिव ग्रहैः ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
व्यराजत रणे पार्थः किंशुकः पुष्पवानिव ||
३४ ख