chevron_left  अग्रतःarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
अग्रतः सर्वसैन्यानां स्थित्वा दुर्मर्षणोऽव्रवीत् ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
अग्रतः सूतपुत्रस्तु कर्णस्तिष्ठतु दंशितः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
अग्रतः स्यन्दनानीकं शरवर्षैरवाकिरत् ||
९० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
अग्रतश्च गजानीकं शरवर्षैरवाकिरत् ||
७४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
वैशम्पाय़न उवाच
अग्रतश्चाभवत्प्रीतो ववन्दे चापि पादय़ोः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
अग्रतश्चैव मे पश्य वसूनष्टौ सुरोत्तमान् |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
अग्रतस्तस्य गच्छन्ति भक्ष्यहेतोर्भय़ानकाः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्रतस्तस्य भगवान्धनेशो गुह्यकैः सह |
५ क
वन पर्व
अध्याय १९८
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्रतस्तु द्विजं कृत्वा स जगाम गृहान्प्रति ||
१६ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अग्रतो देवदूतस्तु यय़ौ राजा च पृष्ठतः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
अग्रतो धर्मराजस्य गान्धारीसहितो यय़ौ ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
अग्रतो मे कृतो राजा छिन्नसर्वपरिच्छदः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
सञ्जय़ उवाच
अग्रतो लक्षय़े यान्तं पुरुषं पावकप्रभम् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
अग्रतो वासुदेवस्य कर्णदुर्योधनावुभौ |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
अग्रतो व्राह्मणान्कृत्वा तपोविद्यादमान्वितान् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
अग्रदाताग्रभोगी स्याद्वलवर्णसमन्वितः |
६२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
अग्रपादस्थितं चेमं विद्धि राजन्वधूजनम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
अग्रभोज्याः प्रसूतीनां श्रिय़ा व्राह्म्यानुकल्पिताः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
अग्रसत्सूतपुत्रस्य दिव्यान्यस्त्राणि माय़या ||
५६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
अग्रहस्तप्रमुक्तेन शीकरेण स फल्गुनम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
अग्रहारं च दास्यामि ग्रामं नगरसंमितम् ||
३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
यक्षा ऊचुः
अग्रहील्लक्षणं स्त्रीणां स्त्रीभूतस्तिष्ठते गृहे |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
अग्रानीके भीमसेनो माद्रीपुत्रौ च दंशितौ |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
अग्राम्यचरितां वुद्धिमत्यन्तं यो न वुध्यते |
३० क
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
अग्राम्यसमवच्छन्नैरगुरूत्तमवासितैः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
अग्राम्यसुखभोगाश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
अग्राह्यमनिवद्धं च वाचः सम्परिवर्जनम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
अग्राह्यमव्यक्तमवर्णमेकं; पञ्चप्रकारं ससृजे प्रजानाम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
अग्राह्यश्चक्षुषा सोऽपि अनिर्देश्यं च तद्गिरा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
जनक उवाच
अग्राह्यावृषिशार्दूल कथमेको ह्यचेतनः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
अग्राह्योऽमृतो भवति य एभिः कारणैर्ध्रुवः ||
३३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
अग्राह्यौ पुरुषावेतावलिङ्गत्वादसंहितौ ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २
सञ्जय़ उवाच
अग्रे पुङ्खे च संसक्ता यथा भ्रमरपङ्क्तय़ः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्रे प्रस्थाप्य यानैः स शत्रुघ्नसहितो यय़ौ ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
अग्रे भवन्तं दृष्ट्वा नो नार्जुनः प्रसहिष्यते ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
अग्रे वभूवुः कृष्णस्य समुद्यतमहाय़ुधाः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
अग्रेऽग्रणीर्यास्यति नो युद्धोपाय़विचक्षणः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
अग्र्यं रथं सुय़न्तारं वहुशस्त्रपरिच्छदम् ||
८४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
अग्र्यः प्रहरणानां च खड्गो माद्रवतीसुत |
८३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
अग्र्यः सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २८७
वैशम्पाय़न उवाच
अग्र्यमग्रे प्रतिज्ञाय़ तेनासि दुहिता मम ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय १०४
वैशम्पाय़न उवाच
अग्र्यमग्रे प्रतिज्ञाय़ स्वस्यापत्यस्य वीर्यवान् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
अग्र्या वुद्धिर्मनसा दर्शने च; स्पर्शे सिद्धिः कर्मणां या च सिद्धिः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
अग्र्यो हि व्राह्मणः प्रोक्तः सर्वस्यैवेह धर्मतः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
अघातय़ं च यत्कर्णं समरेष्वपलाय़िनम् |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
अघाय़ुरिन्द्रिय़ारामो मोघं पार्थ स जीवति ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
अघिहोत्रमनड्वांश्च ज्ञातय़ोऽतिथिवान्धवाः |
५५ क
मौसल पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अघोषय़ंश्च नगरे वचनादाहुकस्य च ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
अघोषय़त्तदा चापि पुरुषो राजधूर्गतः |
२० क