द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
सञ्जय़ उवाच
अमन्यतार्जुनसमो योधो भुवि न विद्यते ||
१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
अमन्यन्त च पुत्रं ते वैश्वानरमुखे हुतम् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
अमन्यमानः क्षत्रिय़ किञ्चिदन्य; न्नाधीय़ते तार्ण इवास्य व्याघ्रः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
मरुत्त उवाच
अमरं याज्यमासाद्य मामृषे मा स्म मानुषम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
अमरत्वं गताः कृष्ण लोकांश्चाश्नुवतेऽक्षय़ान् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२५८
मार्कण्डेय़ उवाच
अमरत्वं धनेशत्वं लोकपालत्वमेव च ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
अमरत्वं सुरा जग्मुः काञ्चनस्य च निःस्रवात् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
अमरत्वमपाहाय़ व्रूहि यत्ते मनोगतम् ||
४५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
अमरप्रतिमाः सर्वे शत्रुसाहाः परन्तपाः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
अमराणां प्रभावेन स्वर्गलोके महीय़ते ||
८९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
अमराणां ह्रदे स्नात्वा अमरेषु नराधिप |
८९ क
वन पर्व
अध्याय
५२
वृहदश्व उवाच
अमरान्वै निवोधास्मान्दमय़न्त्यर्थमागतान् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
अमरावतिसङ्काशं पुरं कामगमं तु तत् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
अमरेशो महादेवो विश्वदेवः सुरारिहा ||
९९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
अमरेष्विव देवेन्द्रो मानुषेषु धनञ्जय़ः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
अमरोऽस्मीति यद्वुद्धिमेतामास्थाय़ वर्तसे |
२६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
अमर्त्य इव मर्त्यः सन्नेष प्राणानधारय़त् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
अमर्त्य इव संमोहात्त्वमात्मानं न वुद्धवान् ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
वृहस्पतिरु उवाच
अमर्त्यं याजय़ित्वाहं याजय़िष्ये न मानुषम् |
८ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
इन्द्र उवाच
अमर्त्यत्वं मत्समत्वं च राज; ञ्श्रिय़ं कृत्स्नां महतीं चैव कीर्तिम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
अमर्त्यस्य हि मर्त्येन सामान्यं नोपपद्यते ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
अमर्यादेन कामेन घोरेणाभिपरिप्लुतः ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
दुर्योधन उवाच
अमर्षं च समाविष्टं धृतराष्ट्रे निवेदय़ ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
अमर्षं दर्शय़ाद्य त्वममर्षो ह्येव पौरुषम् ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
अमर्षं धारय़े चोग्रं तितिक्षन्कालपर्ययम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
अमर्षं पृष्ठतः कृत्वा धर्ममेवाभिकाङ्क्षसे ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
अमर्षं राज्यहरणं वनवासं च पाण्डव |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
अमर्षं राज्यहरणं वनवासं च पाण्डव |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
द्रौपद्यु उवाच
अमर्षजं क्रोधविषं वमन्तौ; दृष्ट्वा चिरं तापमुपैष्यसेऽधम ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
अमर्षजो हि सन्तापः पावकाद्दीप्तिमत्तरः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
अमर्षणं दुर्मतिं राजपुत्रं; पापात्मानं धार्तराष्ट्रं सुलुव्धम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
अमर्षणं धर्षय़तः सुतं मे; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
अमर्षणं निकृतिसमीरणेरितं; हृदि श्रितं ज्वलनमिमं सदा मम |
४८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
अमर्षणं युधां श्रेष्ठं कृतास्त्रं युद्धदुर्मदम् |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
अमर्षणः स्वाः प्रकृतीरभिभूय़ परे स्थिताः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
अमर्षणश्च कौन्तेय़ो दृढवैरश्च पाण्डवः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
अमर्षणा न चान्योन्यं स्पृहय़न्ति कदाचन |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
अमर्षणीय़ं तद्दृष्ट्वा भारद्वाजस्य पातनम् |
७४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
अमर्षणो मर्षणात्मा यज्ञहा कामनाशनः |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
अमर्षणो मर्षितवान्क्लिश्यमानः सदा मय़ा |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
अमर्षपूर्णः सैन्यानि प्रत्यभाषत भारत ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
अमर्षपूर्णस्त्वतिचित्रय़ोधी; शरासनी काञ्चनवर्मधारी |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
अमर्षपूर्णस्त्वनिवृत्तय़ोधी; शरासनी काञ्चनवर्मधारी |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
अमर्षवशमापन्न उदतिष्ठद्विशां पते ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
अमर्षवशमापन्नं निःश्वसन्तं पुनः पुनः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
अमर्षवशमापन्नः कृपः शारद्वतस्तदा ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
अमर्षवशमापन्नः पुत्रोऽस्य परमास्त्रवित् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
अमर्षवशमापन्नः फल्गुनं वाक्यमव्रवीत् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
अमर्षवशमापन्नः श्रुतर्वा भीममभ्ययात् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
तुलाधार उवाच
अमर्षवशमापन्नस्ततः प्राप्तो भवानिह |
५१ क