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शान्ति पर्व
अध्याय १४४
भीष्म उवाच
अमितस्य तु दातारं भर्तारं का न पूजय़ेत् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
अमितात्मभिः सुनिय़तैः शुशुभे स तदाश्रमः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
अमितानां महाशव्दो यान्ति भूतानि सम्भवम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४
द्रुपद उवाच
अमितौजसे तथोग्राय़ हार्दिक्याय़ाहुकाय़ च |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
अमितौजा इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्न्नृपः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
अमितौजा युधामन्युरुत्तमौजाश्च वीर्यवान् |
७५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
अमित्रं नैव मुञ्चेत व्रुवन्तं करुणान्यपि |
५२ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अमित्रं मित्रसम्पन्नं मित्रैर्भिन्दन्ति पण्डिताः |
६६ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अमित्रः शक्यते हन्तुं मधुहा भ्रमरैरिव ||
६८ ख
सभा पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
अमित्रतां याति नरोऽक्षमं व्रुव; न्निगूहते गुह्यममित्रसंस्तवे |
५ क
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
अमित्रप्रहितांश्चापि गदान्परमदारुणान् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अमित्रभृत्यतां प्राप्य ख्यापय़न्तोऽनपत्रपाः ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
अमित्रमपि चेद्दीनं शरणैषिणमागतम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
अमित्रमिव यो भुङ्क्ते सदा मित्रं नरर्षभ ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
अमित्रमुपसेवेत न तु जातु विशङ्कय़ेत् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
अमित्रमुपसेवेत विश्वस्तवदविश्वसन् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
अमित्रवाहिनीं वीराः सम्प्रगाहन्त्यभीरवः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११४
युधिष्ठिर उवाच
अमित्रस्यातिवृद्धस्य कथं तिष्ठेदसाधनः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
अमित्रा एव राजानं भेदेनोपचरन्त्युत |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
अमित्रा नः समृद्धार्था वृत्तार्थाः कुरवः किल |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अमित्रा वाधिताः सर्वे को नु स्वन्ततरो मय़ा ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
अमित्रा हृष्टमनसः प्रत्युद्यान्ति पलाय़िनम् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१३
भीष्म उवाच
अमित्रांश्च वहून्नित्यं पृथगात्मनि पश्यति ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अमित्रांस्तेजसा मृद्नन्नसुरेभ्य इवारिहा |
८२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
अमित्राः सम्प्रसीदन्ति ततो मित्रीभवन्त्यपि ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
अमित्राः सम्प्रसीदन्ति तथा मित्रीभवन्त्यपि ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
अमित्राञ्जहि कौन्तेय़ मित्राणि परिपालय़ ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
अमित्राणां वशे स्थानं राज्यस्य च पुनर्भवः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
दुर्योधन उवाच
अमित्राणां सुमहतीमनुशोचामि मानद ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
अमित्राणामधिष्ठानाद्वधाद्दुर्योधनस्य च |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
अमित्रान्नन्दय़न्सर्वान्निर्मानो वन्धुशोकदः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
अमित्रान्पर्युपासीरन्व्यसनौघप्रतीक्षिणः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
सुधन्वो उवाच
अमित्रान्भूय़सः पश्यन्दुर्विवक्ता स्म तां वसेत् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
अमित्रान्मे महावाहो सानुवन्धान्हनिष्यसि ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
अमित्रान्वाजितामात्यः सोऽवशः परिहीय़ते ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
अमित्राश्च न सन्त्येषां ये चामित्रा न कस्यचित् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१९
नमुचिरु उवाच
अमित्राश्च प्रहृष्यन्ति नास्ति शोके सहाय़ता ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
अमित्राश्च प्रहृष्यन्ति मा स्म शोके मनः कृथाः ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
अमित्रैरनुवद्धस्य द्विषतामस्तु नस्तथा ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अमित्रैरपि सन्धेय़ं प्राणा रक्ष्याश्च भारत ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अमित्रो मित्रतां याति मित्रं चापि प्रदुष्यति |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
अमित्रोपग्रहं चास्य ते कुर्युः क्षिप्रमापदि |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अमिश्रय़दमेय़ात्मा व्राह्ममस्त्रमुदीरय़न् ||
१२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः; सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
अमी रामह्रदाः पञ्च दृश्यन्ते पार्थ दूरतः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
अमी हि त्वा सुरसङ्घा विशन्ति; केचिद्भीताः प्राञ्जलय़ो गृणन्ति |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
अमीमृदत्सर्वथा तेऽद्य कर्णो; ह्यस्त्रैरस्त्राणि किमिदं किरीटिन् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५१
वासुदेव उवाच
अमुं च लोकं त्वय़ि भीष्म याते; ज्ञानानि नङ्क्ष्यन्त्यखिलेन वीर |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
अमुक्तो मानसैर्दुःखैरिच्छाद्वेषप्रिय़ोद्भवैः |
१५० क