कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
अन्यैरपि च पार्थस्य हृतं वर्म महारथैः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
अन्यैर्गुणैरुपेतं तु शुल्कं याचन्ति वान्धवाः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
दुर्योधन उवाच
अन्यैर्गुरुघ्ना वध्यन्तामस्त्रैरस्त्रविदां वर ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
अन्यैर्नरैर्महावाहो वपुषाष्टगुणान्वितम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यैर्वहुविधैर्वित्तैः स निवार्यः पुनः पुनः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
अन्यैश्च क्रतुभिर्धीमान्वहुभिश्चाप्तदक्षिणैः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
अन्यैश्च क्रतुभिर्मुख्यैर्विविधैराप्तदक्षिणैः ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यैश्च पुरुषव्याघ्रैर्व्राह्मणैः शास्त्रदृष्टिभिः |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यैश्च वहुभिर्योधैः सागरानूपवासिभिः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यैश्च वहुभिर्वृक्षैः फलपुष्पसमृद्धिभिः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
अन्यैश्च विविधाकारैर्धौतैः प्रहरणोत्तमैः ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यैश्च विविधैर्गन्धैरनल्पैः समदाहय़न् ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
अन्यैश्च विविधैर्यज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
श्रीकृष्ण उवाच
अन्यैश्चाभरणैश्चित्रैर्भाति भारत मेदिनी ||
३६ ख
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
अन्यैश्चोपाहृतान्यत्र रत्नानीह महात्मभिः ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यैस्त्वं पाण्डवैर्वापि हीनस्ववलवाहनैः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
अन्यो जीवः शरीरस्य नास्तिकानां मते स्मृतः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
अन्यो दुर्योधनात्कर्णाच्छकुनेश्चापि सौवलात् |
४२ क
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यो देवात्सहस्राक्षात्कृष्णाद्वा देवकीसुतात् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
अन्यो धनं प्रेतगतस्य भुङ्क्ते; वय़ांसि चाग्निश्च शरीरधातून् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
अन्यो धनञ्जय़ात्कर्तुमेतत्तत्त्वं व्रवीमि ते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
अन्यो धर्मः समर्थानामापत्स्वन्यश्च भारत ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
अन्यो धर्मः समस्थस्य विषमस्थस्य चापरः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
अन्यो हि नाश्नाति कृतं हि कर्म; स एव कर्ता सुखदुःखभागी |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
अन्यो ह्यग्निरुखाप्यन्या नित्यमेवमवैहि भोः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
अन्यो ह्यत्रान्तरात्मास्ति यः सर्वमनुपश्यति ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
अन्योन्यं कृतवैराणां पुत्रपौत्रं निगच्छति |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं क्रुद्धय़ोर्घोरं यथा द्विरदसिंहय़ोः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं क्षोभय़ामासुः सैन्यानि नृपसत्तम ||
३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यं घातय़िष्यन्ति दृढैः शस्त्रैः प्रहारिणः ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं च महाराज पीडय़ां चक्रतुर्भृशम् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं च शरैस्तीक्ष्णैः क्रुद्धौ राजंस्ततक्षतुः ||
१६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
अन्योन्यं च सभाज्यैवं सुप्रीतमनसः पुनः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यं चातिसंरव्धौ विचेरतुरमर्षणौ |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
युधिष्ठिर उवाच
अन्योन्यं चानुषज्जन्ते वर्तन्ते च पृथक्पृथक् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं छादय़न्तौ स्म शरवृष्ट्या महारथौ |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
अन्योन्यं छिन्दतां शस्त्रैरादित्ये लोहिताय़ति ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं जघ्नतुर्वीरौ गोष्ठे गोवृषभाविव ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
अन्योन्यं जघ्नतुर्वीरौ पङ्कस्थौ महिषाविव ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं जघ्नतुश्चैव नर्दमानौ वृषाविव |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं जघ्निरे क्रुद्धा युद्धरङ्गगता नराः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं जघ्निरे वीरास्तावकाः पाण्डवैः सह ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं ते समाक्रोशन्सैनिका भरतर्षभ |
८५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं ते समासाद्य कुरुपाण्डवसैनिकाः |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
अन्योन्यं तौ जिघांसन्तौ प्रवीरौ पुरुषर्षभौ |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं तौ तदा वाग्भिस्तक्षन्तौ नरपुङ्गवौ |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं तौ महाराज शरवर्षैरवर्षताम् |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यं तौ समासाद्य विचकर्षतुरोजसा |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्योन्यं न सहिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
अन्योन्यं नातिवर्तन्ते सम्पच्च भवति द्विज ||
८ ग