chevron_left  अमृतस्यावमन्तारोarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
अमृतस्यावमन्तारो वक्तारो जनसंसदि |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
युधिष्ठिर उवाच
अमृतस्याव्ययस्येव तृप्तः स्वप्स्याम्यहं सुखम् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
अमृतस्येव नातृप्यन्प्रेक्षमाणा जनार्दनम् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
अमृतस्येव सन्तृप्येदवमानस्य तत्त्ववित् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
अमृतस्येव सन्तृप्येदवमानस्य वै द्विजः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अमृतांशूद्भवो भानुः शशविन्दुः सुरेश्वरः |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अमृतांशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ||
१०० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
अमृताच्चामृतं प्राप्तः शीतीभूतो निरात्मवान् |
१२२ क
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
अमृतादुत्थितं दिव्यं तत्तु वर्म सकुण्डलम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
अमृतादुत्थितं रौद्रं तल्लव्धं सव्यसाचिना |
११ क
वन पर्व
अध्याय २८४
वैशम्पाय़न उवाच
अमृतादुत्थितं ह्येतदुभय़ं रत्नसम्भवम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २३८
व्यास उवाच
अमृतान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
अमृतान्युपजीवन्ति तथा गङ्गाजलं नराः ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
अमृतार्थिनस्ततो व्रह्मन्सहिता दैत्यदानवाः ||
१२ ग
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
अमृतार्थे पुरा पार्थ स च दृष्टो मय़ानघ ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
अमृतार्थे महान्नादो ममेदमिति जल्पताम् ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय १५
सूत उवाच
अमृतार्थे समागम्य तपोनिय़मसंस्थिताः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
अमृताशी वसंस्तत्र स वितृप्तः प्रमोदते ||
१०८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
अमृताशी सदा च स्यात्पवित्री च सदा भवेत् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१४
भीष्म उवाच
अमृताशी सदा च स्यान्न च स्याद्विषभोजनः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
अमृताश्चौषधीः शश्वदाजहार प्रतर्दनः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
अमृतास्वादसदृशं वलतेजोविवर्धनम् |
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
च्यवन उवाच
अमृताय़तनं चैताः सर्वलोकनमस्कृताः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
अमृते मथिते तात देवाञ्शरणमीय़िवान् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
अमृते वसती लोके भविष्यामि सुखान्विता ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १००
नारद उवाच
अमृतेनाभितृप्तस्य सारमुद्गिरतः पुरा |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
अमृतेनावसिक्तस्त्वं नोच्छिष्टं विद्यते गवाम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
अमृतेनेव सन्तृप्तः प्रहृष्टः समपद्यत ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
अमृतोद्भव सद्भाव युगाग्ने विजय़प्रद ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
अमृत्युः कर्मणा केचिन्मृत्युर्नास्तीति चापरे |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अमृत्युः सर्वदृक्सिंहः सन्धाता सन्धिमान्स्थिरः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
अमृत्युर्मृत्युमात्मानमचरश्चरमात्मनः ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
अमृद्नात्समरे राजन्सम्प्रधावंस्ततस्ततः ||
५३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अमृष्यमाणः कर्णस्तु भीमसेनमय़ुध्यत |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
अमृष्यमाणः पार्थेन कार्मुकच्छेदमाहवे ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
अमृष्यमाणः पुनरेव पार्थः; शरान्दशाष्टौ च समुद्ववर्ह ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
अमृष्यमाणः स ततो महात्मा; यशस्विनं सर्वदशार्हभर्ता |
८१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
अमृष्यमाणः सङ्क्रुद्धो धनुर्दिव्यं परामृशत् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
राम उवाच
अमृष्यमाणः सम्प्राय़ाद्यत्र तावपराजितौ ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २६९
मार्कण्डेय़ उवाच
अमृष्यमाणः सवलो रावणो निर्ययावथ |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
अमृष्यमाणश्च महाविमर्दे; तत्राक्रुध्यद्भीमसेनो महात्मा |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
अमृष्यमाणस्तत्पार्थः समाह्वानमरिन्दमः ||
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
अमृष्यमाणस्ताञ्शूरान्दिव्याय़ुधधरान्स्थितान् |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
अमृष्यमाणा भित्त्वोर्वीमुलूपी तमुपागमत् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
अमृष्यमाणा राजानो यस्य जात्या हय़ा इव |
११ क
वन पर्व
अध्याय ५६
वृहदश्व उवाच
अमृष्यमाणा व्यसनं राज्ञो धर्मार्थदर्शिनः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
अमृष्यमाणाः कौन्तेय़ं सङ्ग्रामे जय़गृद्धिनः ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय २१२
वैशम्पाय़न उवाच
अमृष्यमाणाः पार्थस्य समुत्पेतुरहङ्कृताः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
अमृष्यमाणाः संरव्धा युय़ुधानरथं प्रति ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
अमृष्यमाणास्तं शव्दं क्रुद्धाः परमधन्विनः |
१६ ख