वन पर्व
अध्याय
२९४
कर्ण उवाच
अमोघां शत्रुसङ्घानां घातनीं पृतनामुखे ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पितो उवाच
अमोघाः काः पतन्तीह किं नु भीषय़सीव माम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अमोघातिथिनां या च तां गतिं व्रज पुत्रक ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
अमोघार्थः प्रसादश्च अभिगम्यः सुदर्शनः ||
८९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
अमोघासु पतन्तीषु किं धीर इव भाषसे ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
अमोघासु पतन्तीषु धर्मय़ानेन सन्तर ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
अमोघाय़ मृगाक्षाय़ प्रवराय़ुधय़ोधिने |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
अमोघाय़ा विघातार्थं राजन्दुर्मन्त्रिते तव ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
अमोघय़ा महाराज शक्त्या परमभीमय़ा ||
५२ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
अमोघय़ा रणे शक्त्या निहतो भैरवं नदन् ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
अमोचा चैव कौरव्य तथा लम्वपय़ोधरा ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
अमोचय़त्पाण्डुसुतः पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
अमोदनात्पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्धते ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
अम्भसस्तस्य नाशार्थमादित्यास्त्रमथार्जुनः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३००
याज्ञवल्क्य उवाच
अम्भसा वलिना क्षिप्रमापूर्यत समन्ततः ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
अम्भसां वरुणो राजा सत्त्वानां मित्र उच्यते |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६७
गन्धर्व उवाच
अम्भस्यस्या निमज्जेय़मिति दुःखसमन्वितः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
अम्भोधरान्समुद्रांश्च सरांसि सरितस्तथा ||
५३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशय़ोऽन्तकः ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
अम्भोनिधिस्त्वं व्रह्मा त्वं पवित्रं धाम धन्व च |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
अम्भोभिरद्येह वसाम राज; न्नुपोष्यतां चापि भवद्भिरद्य ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भृगुरु उवाच
अम्मय़ं सर्वमेवेदमापो मूर्तिः शरीरिणाम् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
अम्लानान्यपि तत्रासन्कुसुमान्यपराण्यपि ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
अम्लानो वलवाञ्शूरश्छाय़ेवानपगः सदा |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अम्वरीषं च नाभागं मृतं शुश्रुम सृञ्जय़ |
९३ क
वन पर्व
अध्याय
१२९
लोमश उवाच
अम्वरीषश्च नाभाग इष्टवान्यमुनामनु |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अम्वरीषस्य मान्धातुः पृथिवी सा त्वय़ि स्थिता ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
अम्वरीषस्य मान्धातुर्ययातेर्नहुषस्य च |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
अम्वरीषस्य संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३१
व्राह्मण उवाच
अम्वरीषेण या गीता राज्ञा राज्यं प्रशासता ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
अम्वरीषो गवां दत्त्वा व्राह्मणेभ्यः प्रतापवान् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
अम्वरीषो हि नाभागः स्वर्गं गत्वा सुदुर्लभम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
अम्वरे स्नेहमभ्रेभ्यस्तडिद्भ्यश्चोत्तमद्युतिः |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
अम्वष्ठकस्तु नृपतिरभिमन्युमवारय़त् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
अम्वष्ठस्तु गदां गृह्य क्रोधपर्याकुलेक्षणः |
५८ क
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
अम्वष्ठाः कौकुरास्तार्क्ष्या वस्त्रपाः पह्लवैः सह |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
अम्वष्ठान्मालवाञ्शूरांस्त्रिगर्तान्सशिवीनपि |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३६
सञ्जय़ उवाच
अम्वष्ठान्मालवान्वङ्गाञ्शिवींस्त्रैगर्तकानपि |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
अम्वष्ठाश्च विदेहाश्च गान्धाराश्च जितास्त्वय़ा ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
अम्वष्ठैश्च कुणिन्दैश्च क्षिप्तां क्षिप्तां स सात्यकिः |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
अम्वा चैवाम्विका चैव तथैवाम्वालिकापरा ||
९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
अम्वा ज्येष्ठाभवत्तासामम्विका त्वथ मध्यमा |
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
अम्वा तमव्रवीद्राजन्ननङ्गशरपीडिता |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
अम्वा नामेति भद्रं ते कथं सापहृता त्वय़ा ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
अम्वार्थमुद्यतः सङ्ख्ये भीष्मेण युधि निर्जितः ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
अम्वालिका च राजेन्द्र राजकन्या यवीय़सी ||
१० ग
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
अम्वालिकामथाभ्यागादृषिं दृष्ट्वा च सापि तम् |
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अम्वाय़ाश्च प्रिय़ं नित्यं कोऽवधीत्कालचोदितः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
अम्वाय़ास्तां कथां श्रुत्वा काशिराज्ञश्च भारत |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
अम्विकाम्वालिके त्वन्ये यवीय़स्यौ तपोधन ||
१६ ख