आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
अम्विकाम्वालिके भार्ये प्रादाद्भ्रात्रे यवीय़से |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
अम्विके तव पुत्रस्य दुर्नय़ात्किल भारताः |
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
अम्वुदानां यथा काले जलधाराः समन्ततः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
अम्वुदेभ्यो यथा राजन्भ्राजमानाः शतह्रदाः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अम्वोपाख्यानमपि च पर्व ज्ञेय़मतः परम् |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
अरक्षंश्च सुतान्कांश्चित्तदा क्षत्रिय़योषितः ||
५५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
अरक्षन्मकरव्यूहं भीष्मो राजन्समन्ततः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
अरक्षिता दुर्विनीतो मानी स्तव्धोऽभ्यसूय़कः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
अरक्षितात्मा यो राजा प्रजाश्चापि न रक्षति |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
अरक्षितारं राजानं भार्यां चाप्रिय़वादिनीम् |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
अरक्षितारं राजानं भार्यां चाप्रिय़वादिनीम् |
६८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
अरक्षितारं हर्तारं विलोप्तारमदाय़कम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अरक्षितारो लुव्धाश्च मानाहङ्कारदर्पिताः |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
अरक्ष्यमाणं पार्थेन जिष्णुना ससुतानुजम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
कर्ण उवाच
अरक्ष्यमाणं शलभा यथा दीपं मुमूर्षवः |
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
अरक्ष्यमाणं हि वृको हन्यात्सिंहं महावने |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
अरक्ष्यमाणं हि वृको हन्यात्सिंहं महावलम् |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
अरक्ष्यमाणः पार्थेन यदि तिष्ठसि संय़ुगे |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
अरक्ष्यमाणः शतधा विशीर्ये; द्ध्रुवं न नाशोऽस्ति कृतस्य लोके ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
कश्यप उवाच
अरक्ष्यमाणः सततमश्रु पापं च वर्षति ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
अरक्ष्यमाणः समरे क्षिप्रं प्राणान्विमोक्ष्यते ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
अरक्ष्यमाणा विधिवत्क्षत्रिय़ैर्धर्मरक्षिभिः ||
६३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
अरक्ष्यमाणान्येतानि त्रैलोक्यस्यापि पाण्डव |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
अरजांसि च वस्त्राणि धारय़न्ती गतक्लमा |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
अरजांसि च वासांसि वसानाः कौशिकानि च |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
अरजे वाससी रक्ते वसानः पावकात्मजः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
अरजोम्वरसंवीतः सिंहखेलगतिर्नृपः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
अरञ्जय़त्प्रजा वीरो धर्मेण परिपालय़न् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
अरणीं त्वथ सङ्गृह्य ममन्थाग्निचिकीर्षय़ा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
अरणीं ममन्थ व्रह्मर्षिस्तस्यां जज्ञे शुको नृप ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३४
व्राह्मण उवाच
अरणीं व्राह्मणीं विद्धि गुरुरस्योत्तरारणिः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
वासुदेव उवाच
अरणीमग्निकामो वा मथ्नाति हृदय़ं मम |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
गालव उवाच
अरणीव हुताशानां योनिराय़तलोचना ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९८
वैशम्पाय़न उवाच
अरणीसहितं चेदं व्राह्मणाय़ प्रय़च्छत |
२० क
विराट पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अरणीसहितं तस्मै व्राह्मणाय़ न्यवेदय़त् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९८
धर्म उवाच
अरणीसहितं तस्य व्राह्मणस्य हृतं मय़ा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२९५
वैशम्पाय़न उवाच
अरणीसहितं मह्यं समासक्तं वनस्पतौ |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२९८
युधिष्ठिर उवाच
अरणीसहितं यस्य मृग आदाय़ गच्छति |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
अरणीसहितं स्कन्धे वद्ध्वा गच्छत्यनावृतः ||
५३ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
अरणीसहितस्यार्थे तच्च निस्तीर्णवानसि ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
अरण्यं घोरसंनादं शापग्रस्तः परिभ्रमन् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
अरण्यं निर्जनं गत्वा सदारः परिचक्रमे |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
अरण्यगमनं क्षिप्रं रोचतां वो गुणाधिकम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
अरण्यगमनान्नित्यं मलिनो मलसंय़ुताः ||
१८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
अरण्यगमने वुद्धिर्गान्धारीसहितस्य मे |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
अरण्यगोचरो नित्यं न ग्रामं प्रविशेत्पुनः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१०६
वैशम्पाय़न उवाच
अरण्यनित्यः सततं वभूव मृगय़ापरः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
अरण्यमनुसम्प्राप्तः कृत्वा द्रोणं महीमय़म् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
अरण्यराट्क्षुधाविष्टः किं मां न त्रातुमर्हसि ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
अरण्यराडय़ं श्रीमांश्चतुर्दंष्ट्रो महाहनुः |
३० क