मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
अघोषय़न्त पुरुषास्तत्र केशवशासनात् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
अघ्न्या इति गवां नाम क एनान्हन्तुमर्हति |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
अघ्राणमवितर्कं च सत्त्वं प्रविशते परम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्कमानीय़ धर्मात्मा पर्यदेवय़दातुरः ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्कमारोप्य तं पुत्रमिदं वचनमव्रवीत् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२९३
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्कमारोप्य तं वालं भार्यां वचनमव्रवीत् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्कमारोपय़ामास प्रश्रय़ावनतं तदा ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
अङ्कितः स्वैः शुभैः पुण्यैः पापैर्वाप्युपपद्यते ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
अङ्कुरं तं स कृतवांस्ततः पर्णद्वय़ान्वितम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
अङ्कुराद्यास्तथा वर्ज्या इह शृङ्गाटकानि च ||
४० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
अङ्कुशाङ्गुष्ठनुदितः स गजप्रवरो युधि |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
अङ्कुशैरपविद्धैश्च परिस्तोमैश्च भारत ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
अङ्के कुरुष्व राजानं धृतराष्ट्र युधिष्ठिरम् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
अङ्के शिरः समाधाय़ रुरुदुर्वहुविस्तरम् ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
अङ्केनाङ्कं च सङ्क्रम्य रुरुदुर्भूतले तदा ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्कैर्लक्षैश्च ताः सर्वा लक्षय़ामास पार्थिवः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्कय़ामास वत्सांश्च जज्ञे चोपसृतास्त्वपि |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्ग दुर्योधनं कृष्ण मन्दं शास्त्रातिगं मम ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६७
धृतराष्ट्र उवाच
अङ्ग सञ्जय़ मे शंस पन्थानमकुतोभय़म् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गं वृहद्रथं चैव मान्धाता समरेऽजय़त् ||
८१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गं वृहद्रथं चैव मृतं शुश्रुम सृञ्जय़ |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
अङ्गः स गौतमेनापि गङ्गाकूलेऽभिरक्षितः ||
७२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
अङ्गचूडः शिखावर्तो हेमनेत्रो विभीषणः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
अङ्गदं कृतकर्माणं यौवराज्येऽभ्यषेचय़त् ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
अङ्गदस्त्वथ लङ्काय़ा द्वारदेशमुपागतः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
अङ्गदान्यथ चित्राणि महार्हाणि धनूंषि च ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२९०
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गदी वद्धमुकुटो दिशः प्रज्वालय़न्निव ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
अङ्गदी वद्धमुकुटो हस्ताभरणवान्नृपः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
अङ्गदैः कुण्डलैर्निष्कैः शस्त्रैश्चैवावभासिता ||
२७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गदैर्हस्तकेय़ूरैः स्रग्भिश्च समलङ्कृतम् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
अङ्गदोऽभिमुखः शूरमुत्तमौजसमाहवे |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
अङ्गप्रत्यङ्गसम्भूतश्चतुर्थ्यामभवद्गुहः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
अङ्गमेतन्महद्राज्ञां धनिनो नाम भारत |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गराज्यं च नार्हस्त्वमुपभोक्तुं नराधम |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गराज्याभिषेकार्द्रमश्रुभिः सिषिचे पुनः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०७
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गवङ्गकलिङ्गेषु यानि पुण्यानि कानिचित् |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
अङ्गवङ्गादय़श्चैव राजानः सुमहावलाः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
अङ्गश्चैवौरसः श्रीमान्राजा भौमश्च वीर्यवान् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गस्य यजमानस्य तदा विष्णुपदे गिरौ |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
अङ्गहीनान्कृपणान्वामनांश्च; आनृशंस्याद्धृतराष्ट्रो विभर्ति ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
अङ्गा वङ्गाः कलिङ्गाश्च यकृल्लोमान एव च ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अङ्गा वङ्गाश्च पुण्ड्राश्च मागधास्ताम्रलिप्तकाः ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
अङ्गा वङ्गाश्च पुण्ड्राश्च शानवत्या गय़ास्तथा ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अङ्गाः क्रुद्धा महामात्रा नागैर्नकुलमभ्ययुः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
अङ्गाङ्गावय़वैश्छिन्नैर्व्याय़ुधास्तेऽपतन्क्षितौ |
१०२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
अङ्गात्मनः कर्म निवोध राज; न्धर्मार्थय़ुक्तादार्यवृत्तादपेतम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
द्वारपाल उवाच
अङ्गात्मानं समवेक्षस्व वालं; किं श्लाघसे दुर्लभा वादसिद्धिः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गादङ्गात्सम्भवसि हृदय़ादभिजाय़से |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
अङ्गानां वर्धनादम्वा वीरसूत्वेन वीरसूः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
अङ्गानि च समग्राणि न च लोकेषु धिक्कृतः ||
३८ ख