chevron_left  अरण्यवासाद्दिष्ट्यासिarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अरण्यवासाद्दिष्ट्यासि विमुक्तो जय़तां वर ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २५१
जय़द्रथ उवाच
अरण्यवासिनः पार्थान्नानुरोद्धुं त्वमर्हसि ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
अरण्यवासिनः सप्त सप्तैषां ग्रामवासिनः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ८६
यय़ातिरु उवाच
अरण्यवासी सुकृते दधाति; विमुच्यारण्ये स्वशरीरधातून् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
अरण्यवासेन विवर्धते तु; भीमस्य कोपोऽग्निरिवानिलेन ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३११
भीष्म उवाच
अरण्यामेव सहसा तस्य शुक्रमवापतत् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
अरण्ये गृहवासे च शूराश्चातिथिपूजने |
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
अरण्ये दुःखवसतिरनुभूता तपस्विभिः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
अरण्ये दुःखवसतीर्मत्कृते पुरुषोत्तमाः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
अरण्ये निःशलाके वा तत्र मन्त्रो विधीय़ते ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
अरण्ये निःशलाके वा न च रात्रौ कथञ्चन ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
अरण्ये फलमूलाशी चरिष्यामि मृगैः सह ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अरण्ये मृगय़ाशीलो न्यवसत्सजनस्तदा ||
६७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
अरण्ये यो विमुञ्चेत सङ्ग्रामे वा तनुं नरः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
अरण्ये वसतां तात भ्रातॄणां ते तपस्विनाम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ८६
यय़ातिरु उवाच
अरण्ये वसतो यस्य ग्रामो भवति पृष्ठतः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
व्यास उवाच
अरण्ये विचरैकाकी येन केनचिदाशितः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
अरण्ये विजने न्यस्तं परस्वं वीक्ष्य ये नराः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
अरण्ये विविधाः क्लेशाः सम्प्राप्तास्तैः सुदारुणाः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३३
भीष्म उवाच
अरण्ये साय़पूर्वाह्णे मृगय़ूथप्रकोपिता |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
अरतिं दुर्जय़ां चैव घोरां तृष्णां च पार्थिव |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अरतिश्च विषादश्च न स्पृहा चाविशन्त तान् ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
अरतिश्चैव तन्द्री च कामक्रोधौ क्षय़ोदय़ौ ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
अरत्निना चाभिहत्य शिरः काय़ादपाहरत् ||
५९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अरत्नीनां सहस्रं च शतानि दश पञ्च च |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
दुर्योधन उवाच
अरथश्चानिषङ्गी च निहतः पार्ष्णिसारथिः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
अराक्षसमिमं लोकं कर्तास्मि निशितैः शरैः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
अरागद्वेषसंय़ुक्तः सोमवत्प्रिय़दर्शनः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
अरागमोहो निर्द्वन्द्वो न शोचति न सज्जते |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
अराचीनोऽपि वैदर्भीमेवापरामुपय़ेमे मर्यादां नाम |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
अराजकं जगत्सर्वमभिभूतमुपद्रवैः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
अराजकाः प्रजाः पूर्वं विनेशुरिति नः श्रुतम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
अराजकानि राष्ट्राणि हतराजानि वा पुनः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
अराजके जीवलोके दुर्वला वलवत्तरैः |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
अराजकेषु राष्ट्रेषु धर्मो न व्यवतिष्ठते |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ९९
सत्यवत्यु उवाच
अराजकेषु राष्ट्रेषु नास्ति वृष्टिर्न देवताः ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
अराजपुत्रस्त्वमनार्यवृत्तो; लुव्धस्तथा वन्धुषु पापवुद्धिः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय १५४
द्रोण उवाच
अराजा किल नो राज्ञः सखा भवितुमर्हति ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
अराजा किल नो राज्ञां सखा भवितुमर्हति |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
अराजा चोर्ध्वरेताश्च यथा सुविदितं तव |
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ७९
यय़ातिरु उवाच
अराजा भोजशव्दं त्वं तत्रावाप्स्यसि सान्वय़ः ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
अराज्ञो राजवत्पूजा तथा ते मधुसूदन ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
अरात्रिरत्रिरित्येव नाम मे विद्धि शोभने ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
अरात्रिरत्रेः सा रात्रिर्यां नाधीते त्रिरद्य वै |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय २९
सूत उवाच
अरान्तरेणाभ्यपतत्सङ्क्षिप्याङ्गं क्षणेन ह ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
अरालपक्ष्मनय़नां तथा मधुरभाषिणीम् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
अरिं च मित्रं च कुशीलवं च; नैतान्साक्ष्येष्वधिकुर्वीत सप्त ||
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय २०
जरासन्ध उवाच
अरिं विव्रूत तद्विप्राः सतां समय़ एष हि ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
अरिक्षय़ं च सङ्ग्रामे तेन ते सुखमाप्नुवन् ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अरिणापि समर्थेन सन्धिं कुर्वीत पण्डितः |
१९३ क