आदि पर्व
अध्याय
२२४
मन्दपाल उवाच
अरुन्धती पर्यशङ्कद्वसिष्ठमृषिसत्तमम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
अरुन्धती वा सुभगा वसिष्ठं; लोपामुद्रा वापि यथा ह्यगस्त्यम् |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
अरुन्धतीं ततो दृष्ट्वा तीव्रं निय़ममास्थिताम् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
अरुन्धतीव नारीणां स्वर्गलोके महीय़ते ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
अरुन्धतीवटं गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
१३०
लोमश उवाच
अरुन्धतीसहाय़श्च वसिष्ठो भगवानृषिः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
अरुन्धत्तां सुदुष्टात्मा सर्वतः पाण्डुनन्दन |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
अरुन्धत्यपि कल्याणी तपोनित्याभवत्तदा ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
अरुन्धत्या वरस्तस्या यो दत्तो वै महात्मना ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
अरुष्यन्क्रुश्यमानस्य सुकृतं नाम विन्दति |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
अरूपमनभिज्ञेय़ं दृष्ट्वात्मानं विमुच्यते ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
अरेर्वा प्रणिपातेन मा स्म तेषु मनः कृथाः ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
अरेर्हि दुर्हताद्भेय़ं भग्नपृष्ठादिवोरगात् ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
अरोगः प्रीतिमांश्चैव भविष्यति न संशय़ः ||
१३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
अरोगजातीय़मुदारवाक्यं; दूतं वदन्त्यष्टगुणोपपन्नम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
अरोगप्रकृतिर्युक्तः क्रिय़ावानविकत्थनः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
अरोगस्तव नेय़श्च सिद्धार्थश्च भविष्यति ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
अरोगा रूपवन्तस्ते धनिनश्च भवन्त्युत ||
१०९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
अरोगाः पुष्पिताः सन्ति तस्माज्जिघ्रन्ति पादपाः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अरोगाः सर्वसिद्धार्था मनुष्या अकुतोभय़ाः |
१३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अरोगाः सर्वसिद्धार्थाः प्रजा रामे प्रशासति ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
अरोगाः सर्वसिद्धार्थाश्चतुर्वर्षशताय़ुषः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
अरोगाणां स्पृहय़ते मुहुर्मृत्युमपीच्छति |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
अरोगाणामपापानां पापैर्मांसोपजीविभिः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
अरोगानक्षतैर्देहैः पश्येय़मिति मे मतिः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
अरोगान्सर्वसिद्धार्थान्क्षिप्रं द्रक्ष्यसि पाण्डवान् |
९८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
अरोचय़ं वरकृते तथैव वहुलानृषीन् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
अरोचय़ंस्तु सर्वेऽन्ये कृच्छ्रेण तु युधिष्ठिरः ||
११२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
अरोचय़न्त सैन्यानि तथा चान्योन्यमव्रुवन् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
अरोचय़न्सुरा धर्मं धर्मं तत्यजिरेऽसुराः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
अरोषणो यः समलोष्टकाञ्चनः; प्रहीणशोको गतसन्धिविग्रहः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
अरोषणो हि धर्मात्मा सततं धर्मवत्सलः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
अरोषणो ह्यसौ देवो यस्य भागोऽय़मुद्यतः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
अरोषमोहः समलोष्टकाञ्चनः; प्रहीणशोको गतसन्धिविग्रहः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
अरोषमोहो गतसन्धिविग्रहो; भवेदुदासीनवदात्मविन्नरः ||
२८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
व्यास उवाच
अरोषस्तव चैवास्तु पार्थाः सन्तु निरामय़ाः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
युधिष्ठिर उवाच
अरौ वर्तेत नृपतिस्तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
अरौत्सीच्चेतनाय़ुक्तः कामात्कोलाहलः किल ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
अरौत्सीत्पार्थिवं क्षत्रमृते कौरवय़ादवान् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः |
११० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
अर्कं च सहसा दीप्तं स्वर्भानुरभिसंवृणोत् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७२
भीमसेन उवाच
अर्कजश्च वलीहानां चीनानां धौतमूलकः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
अर्कज्वलनतेजोभिर्वज्राशनिसमप्रभैः |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
अर्कपत्राणि भक्षय़ित्वान्धीभूतोऽस्मि |
५७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२०
मार्कण्डेय़ उवाच
अर्कपुष्पैस्तु ते पञ्च गणाः पूज्या धनार्थिभिः |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
अर्कप्रकाशा भ्राजिष्णुः सर्वतः कामचारिणी |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
अर्करश्मिप्रभिन्नेषु शस्त्रेषु कवचेषु च |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९८
नारद उवाच
अर्कस्फटिकशुभ्राणि वज्रसारोज्ज्वलानि च ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अर्को वाजसनः शृङ्गी जय़न्तः सर्वविज्जय़ी ||
९८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
अर्कोऽधिपतिरुष्णानां ज्योतिषामिन्दुरुच्यते ||
७ ख