अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
अर्घार्हान्न च सत्कारैरर्चय़न्ति यथाविधि |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
अर्घे विवदमानं च जघान पशुवत्तदा ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
अर्घ्यं चैवासनं चास्मै दीय़तां परमार्चितम् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
अर्घ्यं ततः समानीय़ पाद्यं चैव महानृषिः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
अर्घ्यं पाद्यं च दत्त्वा स तेभ्यस्तत्र समागमे |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
अर्घ्यं पाद्यं च न्याय़ेन तय़ाभिप्रतिपादितः ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
भीष्म उवाच
अर्घ्यपूर्वेण विधिना वेदोक्तेनाभ्यपूजय़त् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
अर्घ्यमभ्याहरंस्तस्मै ते सर्वे भारतास्तदा |
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
अर्घ्यमाचमनीय़ं वा न यच्छन्त्यल्पवुद्धय़ः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
अर्घ्यमाल्योपहारैश्च शश्वच्च नृपतिर्यतः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्घ्यार्हां नार्चय़सि मां स्वय़ं भार्यामुपस्थिताम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
वासुदेव उवाच
अर्घ्यार्हानिषुभिर्हत्वा भवन्तं नोपसर्पति ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
अर्चां प्रय़ुञ्जानमथो भार्या वचनमव्रवीत् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
अर्चापूर्वं महाराज ततः प्रीणाति मानुषान् ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
अर्चामहेऽर्चितं सद्भिर्भुवि भौमसुखावहम् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चितं पुरुषव्याघ्र सितैर्माल्यैर्यथाविधि ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चितं माल्यदामैश्च सततं सुप्रतिष्ठितम् ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चितः प्रय़यौ भूय़ो दक्षिणं सलिलार्णवम् ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
३४
शिशुपाल उवाच
अर्चितश्च कुरुश्रेष्ठ किमन्यत्प्रिय़काम्यया ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
भीष्म उवाच
अर्चितश्च यथाय़ोगं निषसाद सहैव तैः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
अर्चितश्च स्तुतश्चैव सान्त्वय़ामास ता अपि ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२१
नारद उवाच
अर्चितश्चोत्तमार्घेण दैवतैरभिनन्दितः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
७६
वृहदश्व उवाच
अर्चितानि च सर्वाणि देवताय़तनानि च ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
अर्चितान्वासय़ेथास्त्वं गृहे गुणवतो द्विजान् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चिताश्च नरैः पौरैः पाण्डवा भरतर्षभाः |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
अर्चितेषु प्रलीनेषु तेष्वन्यद्रोचते वनम् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चितैरर्चनार्हैश्च स्तुवद्भिरभिनन्दिताः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
अर्चितोऽस्मि यथान्याय़ं गमिष्यामि धनेश्वर ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
व्यास उवाच
अर्चितोऽहं त्वय़ा राजन्वाग्भिरद्य यदृच्छय़ा |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
११५
अकृतव्रण उवाच
अर्चित्वा पर्युपासीनौ प्राञ्जली तस्थतुस्तदा ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
अर्चित्वा भोजय़ामास मैत्रेय़ोऽशनमुत्तमम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चिर्धाराभिसम्वद्धं धूमविद्युत्समाकुलम् |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
अर्चिर्भिरिव सूर्यस्य दिवाकरसमप्रभौ ||
७० ख
आदि पर्व
अध्याय
२२३
जरितारिरु उवाच
अर्चिषस्ते महावीर्य रश्मय़ः सवितुर्यथा ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
अर्चिषो याश्च ते रुद्रास्तथादित्या महाप्रभाः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
अर्चिष्मतो महेष्वासान्हविषा पावकानिव ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
कुन्त्यु उवाच
अर्चिष्मन्तं वलोपेतं महाभागं महारथम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
अर्चिष्मन्तो वर्हिषदः क्रव्यादाः पितरः स्मृताः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
अर्चिष्मन्तो व्यरोचन्त ध्वजा राज्ञां सहस्रशः ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः |
८१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
अर्चिष्मान्प्रतपँल्लोकान्रथेनोत्तमतेजसा |
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
अर्चेद्देवानदम्भेन सेवेतामाय़या गुरून् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७१
भीष्म उवाच
अर्चेद्देवान्न दम्भेन श्रिय़मिच्छेदकुत्सिताम् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्च्यते मधुपर्कैश्च सुमनोभिर्वसुप्रदः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
अर्च्यते वै विमानस्थः कामभोगैश्च सेव्यते ||
७० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
अर्च्यतेऽर्चितपूर्वं वा व्रूहि यद्यस्ति ते श्रुतिः ||
१०१ ख
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
अर्च्यमर्चितमर्चार्हं सर्वे संमन्तुमर्हथ ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
अर्च्यमर्चितमर्चार्हमनुजानन्तु ते नृपाः ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
उत्तर उवाच
अर्च्याः पूज्याश्च मान्याश्च प्राप्तकालं च मे मतम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
अर्चय़ध्वं सदा लिङ्गं तस्माच्छ्रेष्ठतमो हि सः ||
१०२ ख