शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
अर्चय़न्ति सुरश्रेष्ठं देवं नाराय़णं हरिम् ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
अर्चय़न्नतिथीन्काले दद्याच्चापि प्रतिश्रय़म् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
अर्चय़स्व यथाकामं दैवतानि विशां पते ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
अर्चय़ामः सदा विष्णो परमेशं महेश्वरम् ||
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
अर्चय़ामास तं चापि तस्य राज्ञः पुरोहितः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चय़ामास दाशार्हं सर्वकामैरुपस्थितम् ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चय़ामास देवांश्च द्विजांश्च यदुपुङ्गवः |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चय़ामास देवांश्च व्राह्मणांश्च युधिष्ठिरः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चय़ामास देवांश्च व्राह्मणांश्च सहस्रशः ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चय़ामास रत्नैश्च सर्वकामैश्च धर्मवित् ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चय़ामास वित्तेन मानेन च महारथान् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
अर्चय़ामास वैदर्भी धनेनातीव भामिनी ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
अर्चय़ामास सुप्रीतो भगवान्गोवृषध्वजः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चय़ामासुरर्च्यं तं देशातिथिमुपस्थितम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
अर्चय़ामासुरेवैनमथर्वाणं सुरर्षय़ः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चय़ित्वा जामदग्न्यं पूजितस्तेन चाभिभूः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चय़ित्वा द्विजाग्र्यान्स स्वस्ति वाच्य च वीर्यवान् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
अर्चय़ित्वा पितॄन्देवानश्वमेधफलं लभेत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
अर्चय़ित्वा पितॄन्देवानुपवासपराय़णः |
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
अर्चय़ित्वा पितॄन्देवान्निय़तो निय़ताशनः |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
अर्चय़ित्वा पितॄन्सम्यक्पितृय़ज्ञैर्यथाविधि |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
अर्चय़ित्वा यथान्याय़ं देवेभ्योऽन्नं निवेदय़ेत् |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
९६
लोमश उवाच
अर्चय़ित्वा यथान्याय़मिक्ष्वाकू राजसत्तमः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्चय़ित्वा सुरश्रेष्ठं पूर्वमेव महेश्वरम् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
शुक्र उवाच
अर्चय़िष्येऽहमर्च्यं त्वामर्चितोऽस्तु वृहस्पतिः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
अर्चय़ेत सदा चैव नमस्कारैश्च पूजय़ेत् |
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
अर्चय़ेद्भूतिमन्विच्छन्गृहस्थो गृहमागतम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
अर्चय़ेन्मधुपर्केण परिसंवत्सरोषितान् ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनं कथय़ामास वहुसङ्ग्रामकर्शितम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
अर्जुनं केशव व्रूय़ास्त्वय़ि जाते स्म सूतके |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं च त्रिभिर्भल्लैर्ध्वजमश्वांश्च पञ्चभिः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं च त्रिसप्तत्या ध्वजं चास्य त्रिभिः शरैः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं च त्रिसप्तत्या वाणानामाजघान ह ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं च युधां श्रेष्ठं प्राद्रवन्तं महारथम् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं च रणे यत्तं द्रोणपुत्रो महारथः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं च रणे राजन्योधय़न्स व्यराजत ||
९७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं च शरैर्वीरं स्मय़मानोऽभ्यवाकिरत् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं च सपाञ्चाल्यं दृष्ट्वा संशय़िता जनाः ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनं च समाश्लिष्य यमौ च पुरुषर्षभौ |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं चापि कौन्तेय़ं सदा रक्षति केशवः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं चापि राजेन्द्र धर्मराजो युधिष्ठिरः ||
३४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनं चापि संश्रित्य राजपुत्रा महावलाः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं चाव्रवीत्कृष्णो भृशं राजा परिक्षतः |
५१ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
अर्जुनं चेन्द्रसङ्काशं यमौ तौ च यमोपमौ ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं जय़तां श्रेष्ठं त्वरितो द्रौणिराय़यौ ||
११० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं तत्र दृष्ट्वाथ चुक्रोश महतो रवान् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
अर्जुनं तमपाहाय़ नकुलं जीवमिच्छसि ||
७० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं नकुलं वापि सहदेवमथापि वा ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं पञ्चविंशत्या वाह्वोरुरसि चार्पय़त् ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं पञ्चविंशत्या साय़कानां समाचिनोत् ||
३७ ख