उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनं पाण्डवं वीरं द्रौपद्याः पदवीं चर ||
७९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनं पाण्डवश्रेष्ठमिन्द्रप्रस्थगतं तदा ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
अर्जुनं पुरुषव्याघ्रं द्रौपद्याः पदवीं चर ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२८६
कर्ण उवाच
अर्जुनं प्रति मां चैव विजेष्यामि रणेऽर्जुनम् ||
७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं प्रति संय़त्ता वलवन्तो महारथाः ||
१०७ ख
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनं प्रति संय़ोद्धुं युद्धार्थी स महारथः ||
१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं प्रतिविव्याध दशभिः कङ्कपत्रिभिः ||
६१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं भीमसेनं च निहन्ताराविति ध्रुवम् ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनं भीमसेनं च माद्रीपुत्रौ यमावपि ||
३ ग
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं भीमसेनं च सर्वं कुर्युरसंशय़म् ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं भीमसेनं वा समरे प्राप्य सारथे |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं योधय़न्ति स्म क्षत्रिय़ाः कालचोदिताः ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं योधय़ामास संशप्तकवृतो रणे ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं रभसं युद्धे पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनं वासुदेवं च को वा प्रत्युद्ययौ रथी ||
५९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं वासुदेवं च छादय़ामास पत्रिभिः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं वासुदेवं च पुनः पुनरताडय़त् ||
६३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
अर्जुनं वासुदेवं च ये चान्ये तत्र पार्थिवाः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं वासुदेवं च व्याक्रोशन्त मुहुर्मुहुः |
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं वासुदेवं च शरवर्षैरवाकिरन् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं वीक्ष्य संय़ान्तं जय़द्रथरथं प्रति ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
अर्जुनं वय़मस्मान्वा धनञ्जय़ इति स्म ह ||
५५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं शरवर्षेण वारय़ामास संय़ुगे ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं सप्तसप्तत्या नाराचानां समावृणोत् ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं समभित्यज्य दुद्रुवुर्वै दिशो भय़ात् ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं समरे क्रुद्धं यो वेलामिव धारय़ेत् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं समरे क्रुद्धं वारय़ामास साय़कैः ||
८५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं समरे क्रुद्धः प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः |
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
अर्जुनं समरे दृष्ट्वा सैन्धवस्याग्रतः स्थितम् |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं समरे योद्धुं नोत्सहेतापि वासवः |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं समरे हन्यां मां वा हन्याद्धनञ्जय़ः |
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनं सहिता यत्ताः प्रत्ययुध्यन्त भारत ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं सिषिचुर्वाणैः पर्वतं जलदा इव |
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं सूतपुत्राय़ भीमं दुर्योधनाय़ च ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
अर्जुनं हि निहत्याजौ सम्प्राप्तं स्यात्फलं मय़ा |
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं हृदय़े विद्ध्वा विव्याधान्यैस्त्रिभिः शरैः |
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनः कृष्णमन्वेतु भीमोऽन्वेतु धनञ्जय़म् |
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
अर्जुनः केशवस्यात्मा कृष्णोऽप्यात्मा किरीटिनः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनः कौरवं सैन्यमर्जुनं चापि कौरवाः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनः खलु द्वारवतीं गत्वा भगिनीं वासुदेवस्य सुभद्रां नाम भार्यामुदवहत् |
८५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनः पञ्चविंशत्या भीष्ममार्च्छच्छितैः शरैः |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनः परय़ा प्रीत्या पूर्णचन्द्र इवावभौ ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
अर्जुनः पाण्डवश्रेष्ठः पुरन्दरसुतो वली |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनः पाण्डुपुत्राणां यस्मिन्प्राणाः प्रतिष्ठिताः ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनः पाण्डुरं छत्रं धारय़ामास भानुमत् ||
३४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
अर्जुन उवाच
अर्जुनः प्रतिजानीते भीमस्य प्रिय़काम्यया |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनः प्रत्युवाचेदं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् |
७८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनः प्राप्य गाङ्गेय़ं पीडय़न्निशितैः शरैः |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनः प्राह गोविन्दं क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनः प्राह गोविन्दं शीघ्रं चोदय़ वाजिनः ||
१ ख