वन पर्व
अध्याय
२३२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्य तु तां श्रुत्वा प्रतिज्ञां सत्यवादिनः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य तु भागेन कर्णो वैकर्तनो मतः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्य नरेन्द्रेण वृत्रेणेव शतक्रतोः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य परित्राणं कर्तव्यमिति संय़ुगे ||
८५ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्य प्रभावेण तथा नाराय़णस्य च ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य भय़ात्तूर्णं निघ्नतः शात्रवान्वहून् ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य भय़ात्तूर्णं निरपेक्षा जनाधिपाः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य भय़ाद्राजन्समन्ताद्विप्रदुद्रुवुः ||
२५ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्य मतं ज्ञात्वा भीमसेनो यमौ तथा |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
अर्जुनस्य महत्कर्म स्वय़ं वा स किरीटवान् ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य महास्त्राणि क्रोधं वीर्यं धनुः शरान् |
५५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्य महीपालैर्नानादेशनिवासिभिः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य यथा सत्या प्रतिज्ञा स्याच्चिकीर्षिता ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५५
दुर्योधन उवाच
अर्जुनस्य रथे व्रूहि कथमश्वाः कथं ध्वजः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य रथोपस्थं पूरय़ामासुरञ्जसा ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
धृतराष्ट्र उवाच
अर्जुनस्य रथोपान्ते कीदृशः सोऽभवद्रणः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य लघुत्वाच्च संवृतत्वाच्च तेजसः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा गोविन्दोऽर्जुनमव्रवीत् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा नकुलो वाक्यमव्रवीत् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा नोचुस्तत्र महारथाः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षणः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
अर्जुन उवाच
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा वित्रस्ताभून्निशाचरी |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य वधप्रेप्सू पुत्रार्थे तव धन्विनौ ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य वधार्थाय़ भीमसेनस्य चोभय़ोः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्य वधे क्रूरामकरोत्स मतिं तदा ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य वधोपाय़े तेन द्वैधमकल्पय़त् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अर्जुनस्य वने वासः सुभद्राहरणं ततः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य विघाताय़ दारुणेऽस्मिञ्जनक्षय़े ||
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
अर्जुनस्य विनेतारमाचार्यं सात्यकेस्तथा |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य सुतं त्वेष शिष्यत्वादभिरक्षति |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य सुतं मूढं नाभिहन्तुमिहेच्छति ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य सुतं सङ्ख्ये पीडय़ामास भारत ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
अर्जुनस्य सुतास्ते तु सम्भूय़ावुद्धय़स्तदा |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्यातिभीमेऽस्मिन्कुरुपाण्डुसमागमे ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्याथ दाय़ाद इरावान्नाम वीर्यवान् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
अर्जुनस्याथ दाय़ादा रामेण कृतमन्यवः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्यापि नेता च संय़न्ता चैव वाजिनाम् |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
अर्जुनस्यैष सङ्ग्रामे गुरुभारसहो दृढः ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनाच्छ्रुतकर्माणं शतानीकं च नाकुलिम् ||
७२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनाच्छ्रुतकीर्तिस्तु शतानीकस्तु नाकुलिः ||
१०२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनाच्छ्रुतकीर्तिस्तु शतानीकस्तु नाकुलिः ||
६५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनाद्वेद वेदज्ञात्सकलं दिव्यमानुषम् ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
वृहदश्व उवाच
अर्जुनारिष्टसञ्छन्नं चन्दनैश्च सशाल्मलैः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनार्जुन तिष्ठस्व न मे जीवन्विमोक्ष्यसे |
३ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनार्जुन पश्यास्माँल्लोकपालान्समागतान् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
अर्जुनार्जुन मा भैस्त्वं वज्रमस्त्रमुदीरय़ ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनार्जुन मा युङ्क्ष्व दिव्यान्यस्त्राणि भारत |
१८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनार्जुन यद्दिव्यमस्त्रं ते हृदि वर्तते |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
भीम उवाच
अर्जुनार्जुन वीभत्सो शृणु मे तत्त्वतो वचः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनार्थं महावाहो सात्वतस्य च कारणात् ||
३७ ख