आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
वैरमासीत्तदा तं तु विश्वामित्रोऽन्वपद्यत ||
११ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
वैरमुद्धुक्षितं राज्ञि पुत्रेण तव तन्महत् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
वैरवद्धा भविष्यन्ति परस्परवधेप्सवः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
वैरवन्धकृतं दुःखं हिंसाजं स्त्रीकृतं तथा |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
वैरसन्दीपनावेतौ लोभामर्षौ जनाधिप ||
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
वैरस्य गतमानृण्यं न स्म वाच्या विवक्षताम् |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
वैरस्य च गतः पारं त्वमिहान्यैः सुदुर्गमम् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
वैरस्य चादिकर्तासौ शकुनिर्निहतो युधि ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
वैरस्यान्तं परीप्सन्तौ रणे क्रुद्धाविवान्तकौ ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
वैरस्यान्तं संविधाय़ोपय़ाति; पश्चाच्छान्तिं न च गच्छत्यतीव ||
११ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
वैरस्यास्य गतः पारं हत्वा दुर्योधनं रणे |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
वैरस्यास्यास्त्ववभृथो मूलं छिन्धि दुरात्मनाम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
व्रह्मदत्त उवाच
वैरस्योपशमो दृष्टः पापं नोपाश्नुते पुनः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
वैराग्निः शाम्यते राजन्नौर्वाग्निरिव सागरे ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
वैराग्नेरादिकर्ता च शकुनिः सौवलो हतः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
वैराग्यं पुनरेतस्य मोक्षस्य परमो विधिः |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
वैराग्यवुद्धिः सततं तापदोषव्यपेक्षकः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
वैराग्यस्य हि रूपं तु पूर्वमेव प्रवर्तते |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
वैराजभवने चापि व्रह्मणा न्यवसः सह ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
वैशम्पाय़न उवाच
वैराजसदने नित्यं वैजय़न्तं निषेवते ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
वैराटपृष्ठमुक्षाणं सर्वरत्नैरलङ्कृतम् |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
वैराटि नेह सन्तापस्त्वय़ा कार्यो यशस्विनि |
३९ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
वैराटिरर्जुनं राजन्निदं वचनमव्रवीत् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
वैराटिरुत्तरश्चैव रथो मम महान्मतः ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
वैराटी परमक्रुद्धा युय़ुधे परमाद्भुतम् ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
वैराट्यास्तु सुतं दृष्ट्वा पितरं ते परिक्षितम् |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
वैरान्तकरणो जिष्णुर्न नः शेषं करिष्यति ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७०
गन्धर्व उवाच
वैराय़ैव तदा न्यस्तं क्षत्रिय़ान्कोपय़िष्णुभिः |
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
वैरिणं भीमसेनस्य पूर्वं वकवधेन वै ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
वैरिणं युधि दुर्धर्षं भगदत्तं सुरद्विषम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
व्रह्मो उवाच
वैरूप्यं च न ते देहे कामरूपधरस्तथा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
वैरोचने किमाश्रित्य शोचितव्ये न शोचसि ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
वैरोचने कृतात्मासि स्पृहणीय़ो विजानताम् ||
१०५ ख
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
वैरोचनेर्मय़ा युद्धं दृष्टं चापि सुदारुणम् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
वैवस्वतं पितॄणां च वरुणं चाप्यपां तथा |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
वैवस्वतक्षय़ं घोरं प्रेषय़ामास वीर्यवान् |
६६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
वैवस्वतमिव क्रुद्धं किङ्करोद्यतपाणिनम् ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
वैवस्वतश्चैव यमः पुराणो; देवश्च सोमो वरुणश्चाजगाम ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
युधिष्ठिर उवाच
वैवस्वतसभाय़ां तु यथा वदसि वै प्रभो ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
वैवस्वतस्तद्धरतेऽस्य सर्वं; मोघः श्रमो भवति क्रोधनस्य ||
२७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
भीमसेन उवाच
वैवस्वतस्तु तद्वेद हस्तौ मे रुधिरोक्षितौ ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
वैवस्वतस्य तीर्थे च तीर्थभूतो भवेन्नरः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
वैवस्वतस्य भवनं गतमेनममन्यत ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
वैवस्वतस्य भवनं नेता परमदारुणम् ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
वैवस्वतस्य यामर्थे विश्वकर्मा चकार ह ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
वैवस्वतस्य सदनं न स गच्छेत्कदाचन |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
वैवस्वतस्य सदने महात्मन; स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातय़िष्ये ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
वैवस्वतस्यानुमतांश्च देशा; नदृष्टपूर्वान्सुवहूनपश्यम् ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्रह्मो उवाच
वैवस्वतस्यापि तनुर्विभूता; वीर्येण युष्माकमुत प्रय़ुक्ता |
८ क
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
वैवस्वतादित्यधनेश्वराणा; मिन्द्रस्य विष्णोः सवितुर्विभोश्च ||
११ ख