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वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
अङ्गानि चैव सावित्रि हृदय़ं दूय़तीव च |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
अङ्गान्येतानि कौरव्य प्रकाशानि वलस्य तु |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
अङ्गान्येतानि यज्ञस्य यज्ञो मूलमिति श्रुतिः ||
२६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
अङ्गान्वङ्गान्कलिङ्गांश्च मागधान्काशिकोसलान् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २४९
कोटिकाश्य उवाच
अङ्गारकः कुञ्जरगुप्तकश्च; शत्रुञ्जय़ः सञ्जय़सुप्रवृद्धौ |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
अङ्गारकुशमुञ्जानां पलाशशरपर्णिनाम् |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गारपर्णं गन्धर्वं वित्त मां स्ववलाश्रय़म् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अङ्गारपर्णं निर्जित्य गङ्गाकूलेऽर्जुनस्तदा |
८६ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गारपर्णमिति च ख्यतं वनमिदं मम |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गारपर्णस्तच्छ्रुत्वा क्रुद्ध आनम्य कार्मुकम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
अङ्गारवर्षं मुञ्चन्ती मुहुर्वालधितो महत् ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
अङ्गारवर्षं मुमुचे तदद्भुतमिवाभवत् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
वसिष्ठ उवाच
अङ्गारसंश्रय़ाच्चैव कविरित्यपरोऽभवत् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
अङ्गारिष्ठोऽथ पप्रच्छ कृत्वा समय़पर्ययम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
वसिष्ठ उवाच
अङ्गारेभ्योऽङ्गिरास्तात वालखिल्याः शिलोच्चय़ात् |
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
अङ्गावेक्षस्व धर्मं त्वं यथा सृष्टः स्वय़म्भुवा |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
अङ्गास्तु गजवारेण पाण्डवं पर्यवारय़न् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
अङ्गिरःप्रमुखाश्चैव तथा देवर्षय़ोऽपरे ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
अङ्गिरःप्रमुखाश्चैव तथा व्रह्मर्षय़ोऽपरे |
६७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गिरा गौतमोऽगस्त्यः सुमतिः स्वाय़ुरात्मवान् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
अङ्गिराः कश्यपश्चैव वसिष्ठो भृगुरेव च ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गिराः कश्यपोऽत्रिश्च मरीचिर्भृगुरेव च ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
अङ्गिराः प्राह पुत्रस्य मन्त्रज्ञस्य वृहस्पतेः |
६६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
अग्निरु उवाच
अङ्गिराश्च क्रतुश्चैव कश्यपश्च महानृषिः |
२० ख
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गुल्यग्राणि ददृशे देवी पट्टान्तरेण सा ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अङ्गुल्यग्रेण राजेन्द्र स्वाङ्गुष्ठस्ताडितोऽनघ ||
१०६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
ऋषिरु उवाच
अङ्गुल्यग्रेण राजेन्द्र स्वाङ्गुष्ठस्ताडितोऽभवत् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
अङ्गुल्यङ्गुष्ठमात्रेण हस्तपादेन वा तथा ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अङ्गुष्ठं चरणस्याथ दक्षिणस्यावसेचय़ेत् ||
९३ ख
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गुष्ठपर्वमात्राणां गर्भाणां पृथगेव तु ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
अङ्गुष्ठपर्वमात्रास्ते स्वेष्वङ्गेषु व्यवस्थिताः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं निश्चकर्ष यमो वलात् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो महात्मा; न दृश्यतेऽसौ हृदय़े निविष्टः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
अङ्गुष्ठमात्रास्त्रिदशा मुमुचुः पावकार्चिषः ||
४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
अङ्गुष्ठमात्रो भूत्वा च पुनरेव स राक्षसः |
५९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अङ्गुष्ठस्य च यन्मध्यं प्रदेशिन्याश्च भारत |
९७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अङ्गुष्ठस्यान्तराले च व्राह्मं तीर्थमुदाहृतम् |
९६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
अङ्गुष्ठादसृजद्व्रह्मा मरीचेरपि पूर्वजम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
अर्जुन उवाच
अङ्गेमं प्रतिपद्यस्व गच्छ गन्धर्व मा शुचः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५७
धृतराष्ट्र उवाच
अङ्गेमां समवेक्षस्व पुत्र स्वामेव वाहिनीम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
अङ्गेमामन्ववेक्षस्व राजनीतिं वुभूषितुम् |
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
अङ्गेषु नरशार्दूल स राजासीत्सपत्नजित् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
भीष्म उवाच
अङ्गेषु राजा द्युतिमान्वसुहोम इति श्रुतः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
अङ्गेषु रुधिराक्तास्ते विविशुः शलभा इव ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
शल्य उवाच
अङ्गेषु वर्तते कर्ण येषामधिपतिर्भवान् ||
८३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
अङ्गो नाम नृपो राजंस्ततश्चिन्तां मही यय़ौ ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
अङ्गोऽरिष्टश्च वेनश्च दुःषन्तः सञ्जय़ो जय़ः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
अङ्घ्रिको नैकभृच्चैव शिलाय़ूपः सितः शुचिः |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय १०३
वैशम्पाय़न उवाच
अचक्षुरिति तत्रासीत्सुवलस्य विचारणा |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
अचक्षुर्लभते चक्षुर्वृद्धो भवति वै युवा |
२५ क