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कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
अहितानीव चीर्णानि तेषां ते फलमागतम् ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
अहिते हितसञ्ज्ञस्त्वमध्रुवे ध्रुवसञ्ज्ञकः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
अहितेषु कथं व्रह्मन्वर्तय़ेय़मतन्द्रितः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
अहिरेव ह्यहेः पादान्पश्यतीति निदर्शनम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
भृगुरु उवाच
अहिर्भवस्वेति रुषा शप्स्ये पापं द्विजद्रुहम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
अहिर्वुध्नो निरृतिश्च चेकितानो हरिस्तथा |
१०० क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
अहीनपौरुषा राजन्वलिभिर्वलवत्तमाः ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६६
दुर्योधन उवाच
अहीनाशीविषान्क्रुद्धान्दंशाय़ समुपस्थितान् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
अहीनो नाम राजेन्द्र क्रतुस्तेऽय़ं विकल्पवान् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अहीय़मानं च वलेन कौरवं; निशम्य भेदं च दृढस्य वर्मणः ||
६६ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
अहुतं चाग्निहोत्रं ते सूर्यश्चास्तं गतः प्रभो |
२८ क
वन पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
अहृष्टमनसः सर्वे गते राजन्धनञ्जय़े ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
अहृष्यन्नृषय़ः सर्वे स मां पृच्छतु पाण्डवः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
अहेरिव गणाद्भीतः सौहित्यान्नरकादिव |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
अहेरिव हि धर्मस्य पदं दुःखं गवेषितुम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४९
नाग उवाच
अहो कल्याणवृत्तस्त्वं साधु सज्जनवत्सलः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ८४
यय़ातिरु उवाच
अहो कष्टं क्षीणपुण्यो यय़ातिः; पतत्यसौ पुण्यकृत्पुण्यकीर्तिः |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
पितर ऊचुः
अहो कष्टं यदस्माभिः पूर्वं राज्यमनुष्ठितम् |
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
अहो कष्टमिति ||
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
अहो कष्टमिति ध्याय़ञ्शोकस्यापचितिं चरेत् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
अहो कृच्छ्रं मय़ा प्राप्तमिति निश्चित्य कौशिकः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
अहो कृच्छ्रमनुप्राप्ताः सर्वे स्म भरतर्षभ |
१७ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अहो कृच्छ्रमिति प्राह तस्थौ स च युधिष्ठिरः ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
पुत्र उवाच
अहो क्षत्रसमाचारो यत्र मामपरं यथा |
२ क
स्त्री पर्व
अध्याय ६
धृतराष्ट्र उवाच
अहो खलु महद्दुःखं कृच्छ्रवासं वसत्यसौ |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
अहो गूढतमः प्रश्नस्त्वय़ा पृष्टो जनेश्वर |
१४ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अहो चित्तविकारोऽय़ं स्याद्वा मे चित्तविभ्रमः ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
अहो जीवितमाकाङ्क्षे नेदृशो वधमर्हति |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
अहो ज्ञानेन संय़ुक्तावुभौ चोग्रपराक्रमौ |
२९ क
विराट पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
अहो तवेय़ं परिचारिका शुभा; प्रत्यग्ररूपा प्रतिभाति मामिय़म् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
अर्जुन उवाच
अहो त्वय़ाद्य विप्रेषु भक्तिरागः प्रदर्शितः |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
अहो दानं घुष्यते ते स्वर्गे स्वर्गनिवासिभिः |
५८ क
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
अहो दानं विघुष्टं ते सुमहत्स्वर्गवासिभिः |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
अहो दुःखं महत्प्राप्तं पुत्रेण मम सञ्जय़ |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अहो दुःखमहो कृच्छ्रमहो वैक्लव्यमुत्तमम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
अहो दुःखमिति ध्याय़ञ्शोकस्यापचितिं चरेत् ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
अहो दुःखानि तीव्राणि दुर्योधनकृतान्यहम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच
अहो दुर्मुखमेवैकं युद्धानामविशारदम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
अहो देहप्रदानेन दर्शितातिथिपूजना |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
अहो द्यूतस्य निष्ठेय़ं घोरा सम्प्रति वर्तते ||
१९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
अहो धन्यो हि लोकोऽय़ं सभाग्याश्च नरा भुवि |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
युधिष्ठिर उवाच
अहो धर्मिष्ठता तात वृत्रस्यामिततेजसः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १४५
व्राह्मण उवाच
अहो धिक्कां गतिं त्वद्य गमिष्यामि सवान्धवः |
४० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
अहो धिक्कुरुवीरस्य ह्युरःस्थं काञ्चनं भुवि |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
अहो धिक्पश्य शल्यस्य पूर्णचन्द्रसुदर्शनम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
अहो धिक्सुनृशंसेन जम्वुकेनाल्पमेधसा |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
अहो धिगिति भूतानां शव्दः समभवन्महान् ||
३४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
अहो धिगिति राजा तु विक्रुश्य भृशदुःखितः |
४१ क
स्त्री पर्व
अध्याय २१
गान्धार्यु उवाच
अहो धिगेषा पतिता विसञ्ज्ञा; समीक्ष्य जाम्वूनदवद्धनिष्कम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
अहो धिग्गृध्रवाक्येन संनिवर्तथ मानुषाः ||
८२ ख