उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
हत्वा कुरून्ग्रामजन्ये राज्यं प्राप्य धनञ्जय़ः |
६५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
हत्वा कुरून्ग्रामजन्ये वासुदेवसहाय़वान् ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
हत्वा च समरे क्षुद्रान्पाञ्चालान्पाण्डुभिः सह |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
हत्वा च सहितौ कृष्णौ तय़ोर्वित्तानि सर्वशः |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
हत्वा चाश्वान्सात्यकेः सूतपुत्रः; कैकेय़पुत्रं न्यवधीद्विशोकम् ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
हत्वा चास्य चमूं कृत्स्नां वशमन्वानय़ामहे ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
हत्वा चेत्पुरुषो राजन्निकर्तारमरिन्दम |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
हत्वा चैनं स पुत्रस्ते हताश्वो हतसारथिः |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
हत्वा छित्त्वा च शीर्षाणि रुदतां रुदतीं गृहात् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
हत्वा जन्तुं ततो मांसं तस्माद्दोषोऽस्य भक्षणे ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
हत्वा जित्वा च गन्धर्वांश्चित्रसेनमुखान्रणे |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
हत्वा जित्वा च मघवन्यः कश्चित्पुरुषाय़ते |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
हत्वा ततः स राजेन्द्र धात्र्या हस्तमुपागमत् ||
१० ग
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
हत्वा तत्पुरुषानीकं भीमः सत्यपराक्रमः |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
हत्वा तस्थौ महेष्वासः कर्णोऽरिगणसूदनः ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
हत्वा तु चतुरो वाहांश्चतुर्भिर्निशितैः शरैः |
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
हत्वा तु तद्गजानीकं भीमसेनो महावलः |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
हत्वा तु नृपतिं पार्थ अकरिष्यः किमुत्तरम् |
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
हत्वा तु राजपुत्रं स तत्रैवान्तरधीय़त |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
हत्वा तु समरे पार्थः सहस्रे द्वे परन्तप |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
हत्वा त्वहं धार्तराष्ट्रान्सकर्णा; न्राज्यं कुरूणामवजेता समग्रम् |
९१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
हत्वा दश सहस्राणि कुञ्जराणां तरस्विनाम् |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
हत्वा दश सहस्राणि क्षत्रिय़ाणां महात्मनाम् |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
हत्वा दश सहस्राणि गजानामनिवर्तिनाम् |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
हत्वा दश सहस्राणि पत्तीनां परमेषुभिः |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
हत्वा दश सहस्राणि पार्थिवानां महारथः |
९९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
हत्वा दशसहस्राणि कौसल्यं च महारथम् |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
हत्वा दुर्योधनं चापि प्रय़च्छोर्वीं ससागराम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
हत्वा द्विषन्तं सङ्ग्रामे भुक्त्वा वाह्वर्जितं वसु ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
हत्वा नो विगतो मन्युः शोको मां रुन्धय़त्ययम् ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
हत्वा पञ्च सहस्राणि रथिनां प्रपितामहः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
हत्वा पञ्चशतान्योधाञ्शरैराशीविषोपमैः |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
हत्वा पाञ्चालराजं यो रथमारुह्य तिष्ठति ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
हत्वा पाण्डवय़ोधानामर्वुदं दशभिर्दिनैः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
हत्वा पाण्डुसुतानाजौ सहकृष्णान्ससात्वतान् |
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
हत्वा प्राग्ज्योतिषं पार्थः प्रदक्षिणमवर्तत ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
हत्वा प्रास्यन्दय़द्भीमो नदीं शोणितकर्दमाम् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
युधिष्ठिर उवाच
हत्वा भक्षय़तो वापि परेणोपहृतस्य वा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
हत्वा भित्त्वा च छित्त्वा च केचिदेकान्तशीलिनः ||
९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
हत्वा भ्रातॄन्वय़स्यांश्च पितॄन्पुत्रान्सुहृद्गणान् |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
हत्वा मद्राधिपं पार्थो भोक्ष्यतेऽद्य वसुन्धराम् ||
५८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
हत्वा युधिष्ठिरानीकं पाञ्चालानां रथव्रजान् |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
हत्वा रक्षः क्षितिं प्राप्य कृत्येव निपपात ह ||
६८ ख
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
हत्वा रणे तान्धृतराष्ट्रपुत्राँ; ल्लोके यशः स्फीतमुपाकरोतु ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सात्यकिरु उवाच
हत्वा राजसहस्राणि दर्शय़िष्यामि राजसु ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
हत्वा राजसहस्राणि वहून्याशुपराक्रमः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
हत्वा लाभः श्रेय़ एवाव्ययं स्या; त्सद्यो लाभो वलवद्भिः प्रशस्तः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
हत्वा वद्ध्वा च तान्सर्वानुपाय़ात्स्वपुरं पुरा ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
हत्वा वहुविधां सेनां पाण्डूनां युद्धदुर्मदः |
८८ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
हत्वा वा मां नय़स्वैनान्हतो वाद्येह स्वप्स्यसि ||
२७ ख