द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
अर्हते प्रातिवेश्याय़ श्राद्धं यो न ददाति च |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
अर्हते याचमानाय़ प्रदेय़ं तद्वचो भवेत् |
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
अर्हत्तमः कुरुषु सौमदत्तिः; स नो भ्राता सञ्जय़ मत्सखा च |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
अर्हत्तमो वै धृतिमान्कृपणादधृतात्मनः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
अर्हन्तो नित्यसत्त्वस्था यथालव्धोपजीविनः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
अर्हन्त्यर्धं पृथिव्यास्ते भोक्तुं सामर्थ्यसाधनाः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
अर्हमासनमादिश्य निश्चक्राम ततः पुनः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
अर्हसि मे वाम्यौ दातुमिति ||
५० क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
अर्हस्तस्याहमित्येव तस्मान्मां विन्दते क्षमा ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वासुदेव उवाच
अर्हस्त्वं भीष्म मां द्रष्टुं तपसा स्वेन पार्थिव |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
अर्हस्त्वमसि कल्याण वार्ष्णेय़ं शृणु यत्परम् ||
१० ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
अर्हस्त्वमसि दातुं वै नादातुं भरतर्षभ |
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्हस्त्वमसि धर्मज्ञ राजसूय़ं महाक्रतुम् ||
२० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
अर्हय़न्पुरुषव्याघ्र साधूनामाश्रमे वसेत् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
अर्हय़ित्वा यथान्याय़मुपय़ाजमुवाच सः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
अरय़ो मे समुत्थाय़ वहुभिर्दस्युभिः सह |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
अलं कर्तुं धार्तराष्ट्रास्तव काममरिन्दम ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
अलं कृत्वा तवाधर्मं मण्डूकैः किं हतैर्हि ते ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
अलं कृष्णावमन्यैनं साधु यत्नं समाचर |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१७
शकुनिरु उवाच
अलं क्रोद्धुं तथैतेषां नाय़ं काल उपेक्षितुम् ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५२
कुरुरु उवाच
अलं खेदेन भवतः क्रिय़तां वचनं मम ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
अलं तपोव्रह्मचर्येण युक्तः; सङ्कल्पोऽय़ं मानसस्तस्य सिध्येत् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
अलं तव विनाशाय़ रामवीर्यव्यपाश्रय़ात् ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
अलं तस्य महावाहुर्भीमसेनो महावलः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२५१
जय़द्रथ उवाच
अलं ते पाण्डुपुत्राणां भक्त्या क्लेशमुपासितुम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
अलं ते मानमाश्रित्य सततं परवान्भव ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
अलं ते राममासाद्य वीर्यज्ञो ह्यस्मि तस्य वै |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
उत्तङ्क उवाच
अलं ते व्यपदेशेन प्रमाणं यदि ते वय़म् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
अलं ते शङ्कय़ा भीरु को रामं विषहिष्यति |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
अलं त्रासेन वः शूरा नैष कश्चिन्मय़ि स्थिते |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
धर्म उवाच
अलं देहे मनः कृत्वा त्यक्त्वा देहं सुखी भव |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
अलं द्यूतेन गान्धारे विदुरो न प्रशंसति |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
अलं द्रुतेन वः शूरा इति द्रोणोऽभ्यभाषत ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अलं द्रुतेन वः शूरा न भय़ं कर्तुमर्हथ ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
अलं द्रुतेन वः शूरास्तिष्ठध्वं क्षत्रिय़र्षभाः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
अलं निर्वन्धमागम्य शोकस्य परिवारणम् |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
अलं परिग्रहेणेह दोषवान्हि परिग्रहः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
अलं प्रव्रजितेनेह भद्रे शृणु हितं वचः |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
अलं भारं गुरुं वोढुं दारुणं चारुदर्शनम् |
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
अलं मनुष्यस्य सुखाय़ वर्तितुं; तथा हि युद्धे निहतः परैर्गुरुः ||
४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
अलं युद्धेन ते वीर न तेऽस्त्यद्य पराजय़ः ||
९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१३७
द्रोण उवाच
अलं युद्धेन तैर्वीरैः शाम्य त्वं कुरुवृद्धय़े |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
अलं युद्धेन राजेन्द्र सुहृदां शृणु कारणम् |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
अलं विजेतुं समरे सुतस्ते; स्वनुष्ठितः सारथिना हि तेन ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
अलं विज्ञापनाय़ स्यादाचक्षीथा यथातथम् |
३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
अलं वैरेण ते राजन्पुत्रः सङ्गृह्यतामिति ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
अलं स तेषां सर्वेषामिति मे धीय़ते मतिः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
अलं स्थित्वा श्मशानेऽस्मिन्गृध्रगोमाय़ुसङ्कुले |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
अलकाः सह गन्धर्वैर्यक्षैश्च सह राक्षसैः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
अलक्तं पद्मकं तुङ्गं गन्धांश्चोच्चावचांस्तथा ||
७ ख