शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
अलक्षणा विरूपा च सुभगा शक्र दृश्यते ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
अलक्ष्मीराविशत्येनं शय़ानमलसं नरम् |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
अलक्ष्म्या किल संय़ुक्तो वृत्रं हत्वा शचीपतिः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अलक्ष्यः प्रभय़ा हीनः पौर्णमासीं च कार्त्तिकीम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
अलक्ष्यमाणोऽथ दिवि शरजालेषु सम्पतन् ||
५४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
अलक्ष्याणां तु वीराणां सहस्राणि चतुर्दश |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
अलक्ष्यौ समय़ुध्येतां महत्कृत्वा शरैस्तमः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
अलङ्करणभोज्यं च तथा स्नानानुलेपनम् ||
५७ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
अलङ्कारमथो भोज्यमत ऊर्ध्वं समाचरेः ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
अलङ्कारान्गजानश्वान्कन्याश्चैव वरस्त्रिय़ः |
४ ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
अलङ्काराश्च छत्रं च ध्वजाश्च कवचानि च |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
अलङ्कारैः कवचैः केतुभिश्च; मुखप्रसादैर्हेमवर्णैश्च नॄणाम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
अलङ्कृतं चाश्वशतं वासांसीष्टाश्च दक्षिणाः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
अलङ्कृतं जनाकीर्णं विविशुर्वारणावतम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
अलङ्कृतं द्वीपवत्या मालिन्या रम्यतीरय़ा |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
अलङ्कृतं शुभैः शव्दैः समय़ैर्दिव्यमानुषैः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
अलङ्कृतं शोभमानमुपाय़ाद्राजवेश्म ह ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
अलङ्कृतस्तु स गिरिर्नानारूपविचित्रितैः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
अलङ्कृता द्वारका तु वभूव जनमेजय़ |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
अलङ्कृता वस्त्रवत्यः सुगन्धा; अवीभत्साः सुखिता भोगवत्यः |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
२११
वैशम्पाय़न उवाच
अलङ्कृतां सखीमध्ये भद्रां ददृशतुस्तदा ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२११
वैशम्पाय़न उवाच
अलङ्कृताः कुमाराश्च वृष्णीनां सुमहौजसः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
अलङ्कृतानश्वसादीन्पत्तींश्चाहन्धनञ्जय़ः ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
अलङ्कृतानां देवेश दिव्यैः कनकभूषणैः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
अलङ्कृतामाभरणैररजोम्वरधारिणीम् |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
अलङ्कृतास्त्रय़ो लोकाः पथिभिर्विमलैस्त्रिभिः |
७२ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
अलङ्कृताय़ाः पिटकैर्गन्धैर्माल्यैश्च भूषणैः |
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
अलङ्कृत्य यथाशक्ति प्रदाय़ च धनान्यपि ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
अलङ्कृत्योपहारं तं नैशमस्मै न्यवेदय़त् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
अलङ्कृत्वा वहस्वेति यो दद्यादनुकूलतः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
अलञ्चकार तां शय़्यां परिवार्याय़ुधोत्तमैः ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
अलञ्चकार सोऽऽत्मानं सत्वरः काममोहितः ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
अलञ्चक्रुश्च माल्यौघैः पुरुषा नागसाह्वय़म् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
अलभद्गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमेव च ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
अलभन्त यशः पुण्यं धनानि च विशां पते |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
अलभ्यं लभते मर्त्यस्तत्र का परिदेवना ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
अलभ्यमिच्छन्नैष्कर्म्यान्मूढवुद्धिरिहोच्यते ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
अलभ्या ये शुभा भावाः स्त्रिय़श्चाच्छादनानि च |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
भीमसेन उवाच
अलभ्यामिच्छतस्तस्य कीचकस्य दुरात्मनः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
अलमन्यैरुपालम्भैः कीर्तितैश्च व्यतिक्रमैः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
अलमर्धं पृथिव्यास्ते सहामात्यस्य जीवनम् |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
अलमर्धं पृथिव्यास्ते सहामात्यस्य जीवितुम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
कण्व उवाच
अलमस्मत्समक्षं ते स्तोतुमात्मानमण्डज ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
अलमह्ना निकारोऽय़ं त्रय़ोदश समाः कृतः |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
अलमेव शमाय़ास्मि तथा युद्धाय़ सञ्जय़ |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
घटोत्कच उवाच
अलमेवास्मि कर्णाय़ द्रोणाय़ालं च सत्तम |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
अलमेष महावाहुः कर्णाय़ैको हि पाण्डव |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
अलम्वलं च कर्णं च कुरुसैन्यं च दुस्तरम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
अलम्वलं चाभ्यवर्षन्मेघो मेरुमिवाचलम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
अलम्वलस्ततः क्रुद्धो भैमसेनिं महामृधे |
१५ क