chevron_left  अलातचक्रवत्सैन्यंarrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
अलातचक्रवत्सैन्यं तदाभ्रमत तावकम् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
अलातचक्रवद्राजंस्तत्र तत्र स्म दृश्यते ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
अलातचक्रवद्राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
अलातचक्रवद्राजञ्शरजालैः समर्पय़त् ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
अलातमिव चाविद्धं गाण्डीवं समदृश्यत ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
अलाताक्षी वीर्यवती विद्युज्जिह्वा च भारत ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
अलातोल्काशनिप्रख्यास्तव सैन्यं विनिर्दहन् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
अलाभश्चाप्यरक्तस्य सोऽत्र दोषो विषोपमः ||
६९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
अलाभात्पुरुषाणां हि भय़ात्परिजनस्य च |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६९
भीष्म उवाच
अलाभे न विहन्येत लाभश्चैनं न हर्षय़ेत् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
अलाभे यो गवां दद्यात्तिलधेनुं यतव्रतः |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
नाचिकेत उवाच
अलाभे यो गवां दद्याद्घृतधेनुं यतव्रतः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
अलाभे व्राह्मणस्त्रीणामग्निर्वनमुपागतः ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
पृथिव्यु उवाच
अलाभे व्राह्मणस्याग्नावग्रमुत्क्षिप्य निक्षिपेत् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १०६
सगर उवाच
अलाभेन तथाश्वस्य परितप्यामि पुत्रक ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १०४
लोमश उवाच
अलावुमध्यान्निष्कृष्य वीजं यत्नेन गोप्यताम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
अलाय़ुधं राक्षसेन्द्रं स्वागतेनाभ्यपूजय़न् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
अलाय़ुधं राक्षसेन्द्रमाहूय़ेदमथाव्रवीत् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
वासुदेव उवाच
अलाय़ुधः परसैन्यावमर्दी; घटोत्कचश्चोग्रकर्मा तरस्वी ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
अलाय़ुधविषक्तं तु भैमसेनिं महावलम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
अलाय़ुधस्तु तानस्तान्भीमेन विशिखान्रणे |
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
अलाय़ुधस्तु सङ्क्रुद्धो घटोत्कचमरिन्दमम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
अलाय़ुधस्य तु शिरो भैमसेनिर्महावलः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
अलाय़ुधस्य योधांस्तु राक्षसान्भीमदर्शनान् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
अलाय़ुधेन समरे सिंहेनेव गवां पतिम् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
अलाय़ुधो राक्षसेन्द्रः क्रूरकर्मा महावलः |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
अलाय़ुधो राक्षसेन्द्रः खरवन्धुरय़ानगः |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
अलाय़ुधो राक्षसेन्द्रो वीर्यवानभ्यवर्तत ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
अलाय़ुधोऽद्रवत्तूर्णं क्रुद्धमाय़ान्तमाहवे ||
४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
अलिङ्गग्रहणो नित्यः क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
अलिङ्गा प्रकृतिर्लिङ्गैरुपलभ्यति सात्मजैः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
अलिङ्गां प्रकृतिं त्वाहुर्लिङ्गैरनुमिमीमहे |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३४
व्राह्मण उवाच
अलिङ्गो निर्गुणश्चैव कारणं नास्य विद्यते |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
अलिङ्गो लिङ्गमात्मानमकालः कालमात्मनः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
अलिञ्जरे जले चैव नासौ समभवत्किल ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
अलिञ्जरे प्राक्षिपत्स चन्द्रांशुसदृशप्रभम् ||
११ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अलुप्तधर्मस्तं धर्मं कारय़ित्वा स फल्गुनः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
अलुव्धं लव्धसन्तुष्टं स्वामिमित्रवुभूषकम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
अलुव्धः सत्यवादी च व्रह्मण्यश्चाविहिंसकः |
२० क
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
अलुव्धा विगतक्रोधाः सतां यान्ति सलोकताम् ||
५२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
अलुव्धाः शुचय़ो वैद्या ह्रीमन्तः सत्यवादिनः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
अलुव्धाञ्शिक्षितान्दान्तान्धर्मेषु परिनिष्ठितान् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
अलुव्धान्वुद्धिसम्पन्नान्सर्वकर्मसु योजय़ेत् ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
अलुव्धाश्चैव कौन्तेय़ाः कृतवन्तश्च दुष्करम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
अलुव्धो मतिमान्ह्रीमान्क्षमावान्रूपवान्वली |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
अलेपमाकाशमलिङ्गमेव; मास्थाय़ पश्यन्ति महद्ध्यसक्ताः ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय २
शौनक उवाच
अलोभ इति मार्गोऽय़ं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ||
७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
व्रह्मो उवाच
अलोभकाम्यया देवि तपसा च शुभेन ते |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
शुनःसख उवाच
अलोभादक्षय़ा लोकाः प्राप्ता वः सार्वकामिकाः |
८१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
अलोलुपः शलः सन्धो वातवेगसुवर्चसौ ||
२ ख