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भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
विशोकाः समपद्यन्त धार्तराष्ट्राः सराजकाः ||
७१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
विशोकाश्चाभवन्सर्वे राजानः कुरुभिः सह ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
विशोकेनाभिसंय़त्ता मनोमारुतरंहसः ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४३
व्यास उवाच
विशोको निर्ममः शान्तः प्रसन्नात्मात्मवित्तमः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
विशोको भरतश्रेष्ठ भगदत्तेन संय़ुगे ||
७१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
विशोको विज्वरश्चापि भविष्यामि जनार्दन ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २८३
वैशम्पाय़न उवाच
विशोको विज्वरो राजन्काम्यके न्यवसत्तदा ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
विशोको विज्वरो राजन्भव भूतिपुरस्कृतः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
विश्रमन्ति महावाहो तथान्या मृगजातय़ः ||
३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
विश्रमस्व त्वमव्यग्रः स्वप चेमां निशां सुखम् ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय २२८
धृतराष्ट्र उवाच
विश्रम्भस्तु न गन्तव्यो वल्लवानामिति स्मरे ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३८
व्रह्मो उवाच
विश्रम्भो ह्रीस्तितिक्षा च त्यागः शौचमतन्द्रिता |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
विश्रम्य च यथान्याय़ं पूजय़ित्वा परस्परम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
विश्रम्य चत्वार्युषसः प्रतीताः; सभां विराटस्य ततोऽभिजग्मुः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २९
दुर्योधन उवाच
विश्रम्यैकां निशामद्य भवद्भिः सहितो रणे |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
विश्रवा नाम सक्रोधः स वैश्रवणमैक्षत ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
युधिष्ठिर उवाच
विश्रव्धो गच्छ शैनेय़ मा कार्षीर्मय़ि सम्भ्रमम् |
५० क
वन पर्व
अध्याय ६८
वृहदश्व उवाच
विश्रान्तं च ततः पश्चात्पर्णादं द्विजसत्तमम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
विश्रान्तं चैनमासीनमन्वासीनः स राक्षसः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४१
भीष्म उवाच
विश्रान्तं चैनमासीनमिदं वचनमव्रवीत् ||
९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
विश्रान्तश्च विनिद्रश्च स्वस्थचित्तश्च मानद |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
विश्रान्तश्च समुत्थाय़ कैलासमभितो यय़ौ ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ६६
वृहदश्व उवाच
विश्रान्ता मातरं राजन्निदं वचनमव्रवीत् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
विश्रान्ताँल्लव्धविज्ञानाञ्श्वः समेतास्मि वः पुनः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
विश्रान्ताश्च वितृष्णाश्च पुनर्युद्धाय़ जग्मिरे ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
विश्रान्तास्ते ततोऽपश्यन्भूमिपा भूरिदक्षिणम् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
विश्रान्तास्ते महात्मानः कञ्चित्कालं महावलाः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
विश्रान्ताय़ ततस्तस्मै सहासीनाय़ भार्यया |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४५
व्राह्मण उवाच
विश्रान्तोऽभ्यर्चितश्चास्मि भवत्या श्लक्ष्णय़ा गिरा |
६ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
विश्रान्तोऽसि महाभाग विनिद्रश्च नृपात्मज |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
विश्रान्तौ स्वः प्रभावात्ते ध्यानेनैवेति भार्गव ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
विश्राम्यतामिति वदन्क्लान्तोऽसीति पुनः पुनः ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
विश्राव्य नाम निहता वहवः शूरसंमताः ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
विश्राव्य पलितः प्राज्ञो विलमन्यज्जगाम ह ||
१९१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
विश्राव्य वैरं पार्थेन श्रुताय़ुः स निपातितः ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
विश्रुतं त्रिषु लोकेषु गाण्डीवं विक्षिपन्धनुः ||
६४ ख
आदि पर्व
अध्याय १५९
गन्धर्व उवाच
विश्रुतं त्रिषु लोकेषु भारद्वाजं यशस्विनम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
विश्रुतः सागरान्ताय़ां क्षितौ धर्मार्थतत्त्ववित् ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
विश्रुता कथमज्ञाता कृष्णा पार्थ चरिष्यति ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
विश्रुता त्रिषु लोकेषु तपती तपसा युता ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
विश्रुता त्रिषु लोकेषु माद्री मद्रपतेः सुता ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
विश्रुता राजसंसत्सु श्रुतवाक्या वहुश्रुता ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
विश्रुतां त्रिषु लोकेषु दिव्यां मणिमय़ीं शुभाम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
विश्रुतां त्रिषु लोकेषु श्रावय़ामास वै कथाम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
विश्रुतास्त्रिषु लोकेषु सत्यव्रतपराय़णाः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वं चेदं त्वद्वशे विश्वय़ोने; नमोऽस्तु ते शार्ङ्गचक्रासिपाणे ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
विश्वं व्रह्मासृजत्पूर्वं सर्वादिर्निरवस्करम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
विश्वं हि व्रह्म तपसा मय़ा तत्र समर्पितम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
विश्वं हि व्रह्मभवने सर्वशः परिवर्तते |
२३ ख