chevron_left  अल्पावशिष्टैस्तुरगैरभ्यवर्ततarrow_drop_down
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अल्पावशिष्टैस्तुरगैरभ्यवर्तत सौवलः ||
८१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
सञ्जय़ उवाच
अल्पावशेषं सैन्यं मे कृतं शक्रात्मजेन ह ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २७४
मातलिरु उवाच
अल्पावशेषमाय़ुश्च ततोऽमन्यन्त रक्षसः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १२१
लोमश उवाच
अल्पावशेषा पृथिवी चैत्यैरासीन्महात्मनः |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय २१
गान्धार्यु उवाच
अल्पावशेषो हि कृतो महात्मा; शरीरभक्षैः परिभक्षय़द्भिः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
उमो उवाच
अल्पावाधास्तथा केचिन्महावाधास्तथापरे |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
अल्पावाधो निरीतीकः स जातः सुखमेधते ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
अल्पाश्रय़ानल्पफलान्वदन्ति; धर्मानन्यान्धर्मविदो मनुष्याः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७
युधिष्ठिर उवाच
अल्पाहारतय़ा त्वग्निं शमय़ौदर्यमुत्थितम् |
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
अल्पाय़ां वा महत्यां वा सेनाय़ामिति निश्चितम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अल्पाय़ुः स हि मन्तव्यो न हि धर्मोऽस्ति कश्चन ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अल्पाय़ुर्येन भवति दीर्घाय़ुर्वापि मानवः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अल्पाय़ुषः स्वल्पवला अल्पतेजःपराक्रमाः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अल्पाय़ुषो दरिद्राश्च धर्मिष्ठा मानवास्तदा |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अल्पाय़ुषो भवन्तीह नरा निरय़गामिनः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
राम उवाच
अल्पीय़ांसं विशिष्टं वा तत्ते राजन्परं हितम् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
अल्पे च कारणे कृष्ण हतो गाण्डीवधन्वना |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
अल्पे भुक्ते पुरीषं च प्रभूतमिह दृश्यते |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९५
वामदेव उवाच
अल्पेनापि स दण्डेन महीं जय़ति भूमिपः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
अल्पेनापि हि संय़ुक्तस्तुष्यत्येवापराधिकः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२९
भीष्म उवाच
अल्पेनापि हि सैन्येन महीं जय़ति पार्थिवः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
अल्पेनाल्पेन देय़ेन वर्धमानं प्रदापय़ेत् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १०१
अणीमाण्डव्य उवाच
अल्पेऽपराधे विपुलो मम दण्डस्त्वय़ा कृतः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
अल्पेऽपराधे संरम्भाद्वसिष्ठेन महात्मना ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
अल्पेऽप्यपकृते मूढस्तथाज्ञानात्कृतेऽपि च |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
अल्पेऽप्यपकृते मोहान्न शान्तिमुपगच्छति ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
अल्पोऽपि तादृशो दाय़ो भवत्युत महाफलः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
अल्पोऽपि हि दहत्यग्निर्विषमल्पं हिनस्ति च ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय ५०
दुर्योधन उवाच
अल्पोऽपि ह्यरिरत्यन्तं वर्धमानपराक्रमः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
अल्पोऽप्यतिक्रमो नास्ति पाण्डवानां महात्मनाम् |
४७ क
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
अवकाशं पृथिव्यां वा दिवि वा मधुसूदनः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्राह्मण उवाच
अवकाशविशेषेण कथं वर्तय़तेऽनिलः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७८
भरद्वाज उवाच
अवकाशविशेषेण कथं वर्तय़तेऽनिलः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६९
भीष्म उवाच
अवकीर्णः सुगुप्तश्च न वाचा ह्यप्रिय़ं वदेत् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
कर्ण उवाच
अवकीर्णस्त्वहं कुन्त्या सूतेन च विवर्धितः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
अवकीर्णिनिमित्तं तु व्रह्महत्याव्रतं चरेत् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
अवकीर्णी भवेद्यश्च द्विजातिवधकस्तथा |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
अवकीर्णे सरस्वत्यास्तीर्थे प्रज्वाल्य पावकम् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
अवकीर्णो महावाहुः शैलो मेघैरिवासितैः ||
३६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
अवकीर्णो हि स मय़ा वीरो दुष्प्रज्ञय़ा तदा ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
अवकीर्णोऽभवत्पार्थः स्फुलिङ्गैरिव काञ्चनैः ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
अवकीर्णोऽस्मि ते तेन तद्यशःकीर्तिनाशनम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
अवकीर्य च मां याता परात्मजमिवासती ||
६९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
अवकीर्य स्वधर्मं हि शिष्येण निहतो गुरुः ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
अवकीर्यमाणः संहृष्टो नगरं स्वैरमागमत् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
अवकीर्यमाणाः खगमाः शरवर्षैः समन्ततः |
५ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
अवकीर्यमाणे द्रोणे तु शरैर्गाण्डीवधन्वना |
६३ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
अवकीर्योत्तरीय़ाणि सभाय़ां समुपाविशन् ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
अवक्रगामिभिर्वाणैरभ्यवर्षन्महाय़सैः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
अवक्षिप्तावधूतानामसीनां वीरवाहुभिः |
१७ क