अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
युधिष्ठिर उवाच
अचक्षुर्विषय़ं प्राप्तं कथं धर्मोऽनुगच्छति ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
अचरद्दैत्यसङ्घेषु रुद्रोऽग्निरिव कक्षगः ||
५५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
अचरद्भीमसेनस्तु मार्गान्वहुविधांस्तथा |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
अचरद्रथवृन्देषु निघ्नंस्तेषां वरान्वरान् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२१०
मार्कण्डेय़ उवाच
अचरन्त तपस्तीव्रं पुत्रार्थे वहुवार्षिकम् |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
अचराण्यपि भूतानि खेचराणि तथैव च |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
अचरेभ्यश्च भूतेभ्यश्चराः श्रेष्ठास्ततो नराः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
अचलं नाम वज्राख्यं विहितं वज्रपाणिना ||
७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
अचलं वृषकं चैव भगदत्तं च पार्थिवम् ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२१
नारद उवाच
अचलं शाश्वतं पुण्यमुत्तमं ध्रुवमव्ययम् ||
९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१२१
नारद उवाच
अचलं स्थानमारुह्य दौहित्रफलनिर्जितम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
अचलं स्थानमासाद्य गाण्डीवमनुमन्त्र्य च |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
अचलः कनकाक्षश्च वालानामय़िकः प्रभुः |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
अचलमनिधनं शिवं विशोकं; शुचिमतुलं विदुषां मते निविष्टम् |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
अचलश्चानिकेतश्च क्षेत्रज्ञः स परो विभुः ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
अचला ह्यक्षय़ा भूमिर्दोग्ध्री कामाननुत्तमान् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अचलां श्रिय़माप्नोति श्रेय़श्चाप्नोत्यनुत्तमम् ||
१२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
अचलितमतिरच्युतः स्वधर्मा; त्परिमितसंसरणः परावरज्ञः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
अचले चाप्यनन्ते च प्रतिष्ठे सर्वमातरौ ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
अचलेष्वप्रकम्पेषु मा ते भूदत्र संशय़ः ||
१३७ ख
सभा पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
अचलो वृषकश्चैव कर्णश्च रथिनां वरः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
अचलो वृषकश्चैव भ्रातरौ सहितावुभौ |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
अचलो वृषकश्चैव राक्षसश्चाप्यलाय़ुधः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
अचिन्तितमनुद्दिष्टमसङ्कल्पितमेव च |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
अचिन्त्य एष भगवान्कर्मणा मनसा गिरा |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
अचिन्त्य पाण्डवान्कामाद्यथेष्टं कृतवानसि ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
अचिन्त्य शरवर्षं तु गन्धर्वास्तस्य तं रथम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
अचिन्त्यं चापि तं ज्ञात्वा भावसूक्ष्मं चतुष्टय़म् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
अचिन्त्यं मनसाप्यन्यैः सरोभिः समलङ्कृतम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अचिन्त्यं महदाश्चर्यं पवित्रमपि चोत्तमम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
७३
शुक्र उवाच
अचिन्त्यं व्रह्म निर्द्वन्द्वमैश्वरं हि वलं मम ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
अचिन्त्यः पुण्डरीकाक्षो नैष केवलमानुषः ||
४६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
अचिन्त्यत्वाद्धि चित्तानां मनुष्याणां विशेषतः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
अचिन्त्यमद्भुतं चैव तय़ोः कर्मातिमानुषम् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
अचिन्त्यमनभिज्ञेय़ं सर्वभूतभय़ङ्करम् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
अचिन्त्या दिव्यसङ्कल्पा प्रभोरेषैव संविधिः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
अचिन्त्या विविधास्तत्र द्रुमाः परमशोभनाः ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण साधय़ेत् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१०९
वैशम्पाय़न उवाच
अचिन्त्यानद्भुतान्भावान्ददर्श सुवहून्नृपः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
अचिन्त्याय़ाम्विकाभर्त्रे सर्वदेवस्तुताय़ च |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
अचिन्त्योऽथाप्यनिर्देश्यः सर्वप्राणो ह्ययोनिजः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
अचिन्तय़ंश्च ते सर्वे पाण्डवानां महारथाः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अचिन्तय़दमेय़ात्मा नास्ति यौधिष्ठिरं वलम् ||
६६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अचिन्तय़द्रणे वीरो वुद्ध्या परपुरञ्जय़ः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
अचिन्तय़न्कञ्चिदन्यं यावज्जीवं तथाचरेत् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
अचिन्तय़न्तस्तु शरान्वय़ं युध्याम भारत ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
अचिन्तय़न्नमेय़ात्मा सर्वं तद्राजमण्डलम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
अचिन्तय़न्ममेदं ये रूपं द्रक्ष्यन्ति कानने |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
अचिन्तय़न्महावाहुः शैनेय़स्य रथं प्रति ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
अचिन्तय़न्वै स शरान्नात्यर्थं सम्भ्रमाद्वली |
३४ क