वन पर्व
अध्याय
२८६
सूर्य उवाच
अवध्यो ह्यसि भूतानां कुण्डलाभ्यां समन्वितः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
अवध्योऽहं भवेय़ं वै वर एष वृतो मय़ा ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
अवध्योऽहं महीपाल युध्यस्व जय़माप्नुहि ||
६९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
अवध्योऽय़ं भवेल्लोके शत्रूणां तनय़ो मम ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
अवध्यौ च यथा वीरौ संय़ुगेष्वपराजितौ |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
अवध्यौ वदतोः कृष्णौ संनिधौ वै महीक्षिताम् ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०१
नारद उवाच
अवध्यौ सर्वलोकस्य स्वमेव भवनं गतौ ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९४
कर्ण उवाच
अवनिं प्रमदा गाश्च निर्वापं वहुवार्षिकम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
अवनितलगतैश्च भूतसङ्घै; रतिविवभौ हुतभुग्यथाज्यसिक्तः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
८७
धौम्य उवाच
अवन्तिषु प्रतीच्यां वै कीर्तय़िष्यामि ते दिशि |
१ क
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
अवन्तीमृक्षवन्तं च समतिक्रम्य पर्वतम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
अवन्दत तदा कृष्णो वाङ्मनोवुद्धिकर्मभिः ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
अवन्ध्यं दिवसं कुर्यादन्नदानेन मानवः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
अवन्ध्यकालो वश्यात्मा तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
अवप्लुतः सिंह इवाचलाग्रा; ज्जगाम चान्यं भुवि भूमिदेशम् ||
३५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
अवप्लुतौ रथोपस्थाद्युधामन्यूत्तमौजसौ ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
अवप्लुत्य ततो वाहाद्वाह्लिकः पुरुषोत्तमः |
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
अवप्लुत्य रथाच्चापि त्वरितः स महारथः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
अवप्लुत्य रथात्तस्माच्चित्रसेनो महारथः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
अवप्लुत्य रथात्तूर्णं तव सैन्यमभीषय़त् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
अवप्लुत्य रथात्तूर्णं तस्थौ गिरिरिवाचलः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
अवप्लुत्य रथात्तूर्णं दण्डपाणिरिवान्तकः ||
२८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
अवप्लुत्य रथात्तूर्णं भग्नवेगः पराक्रमी ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
अवप्लुत्य रथात्तूर्णं वाहुभ्यां समवारय़त् ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
अवप्लुत्य रथात्तूर्णं सव्रीडो मनुजाधिपः ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
अवप्लुत्य रथाद्वीरौ भीममाद्रवतां ततः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
अवप्लुत्याथ पाञ्चाल्यो रथात्तूर्णं महावलः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
अवभर्त्स्य च राधेय़मिदं वचनमव्रवीत् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२५१
वैशम्पाय़न उवाच
अवमत्यास्य तद्वाक्यमाक्षिप्य च सुमध्यमा |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
अवमन्य गुरुं मां च क्षिप्रं त्वं न भविष्यसि ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६९
वसिष्ठ उवाच
अवमन्य ततः कोपाद्भृगूंस्ताञ्शरणागतान् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
अवमन्य ददौ मूढा शूद्रां धात्रेय़िकां हि मे ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
अवमन्य नरेन्द्रत्वं देवेन्द्रत्वं च पार्थिव ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अवमन्य रय़ं हंसानिदं वचनमव्रवीत् |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
अवमन्य वहूंश्चाहं काकानन्यांश्च पक्षिणः |
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
अवमन्य स तत्सर्वं स्वरूपं प्रतिपद्य च |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
अवमन्यत तान्वीरान्देवपुत्रानरिन्दमान् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
अवमन्यति यः सिद्धान्क्रुद्धाश्चापि शपन्ति यम् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
अवमन्यन्ति भर्तारं संहर्षादुपजीविनः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
अवमन्यमानो यान्याति वृद्धान्साधूंस्तथा गुरून् ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
अवमन्यसे मां गान्धारे ध्रुवं मां परिशङ्कसे |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
अवमन्यसे मां नृपते नूनं दुर्मन्त्रितं तव |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
अवमन्यात्मनात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
मन्दपाल उवाच
अवमन्येत तं लोको यथेच्छसि तथा कुरु ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
अवमन्येद्वासुदेवं तमाहुस्तामसं जनाः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
अवमन्येह नः सर्वान्करोति कदनं महत् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
अवमर्दः प्रतीघातः केतनानां च भञ्जनम् ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
अवमर्दः प्रतीघातस्तथैव च वलीय़साम् ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
अवमानः कुसम्वन्धे भवत्यर्थविपर्यये ||
९१ ख