उद्योग पर्व
अध्याय
११४
नारद उवाच
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य प्रजाहेतोर्नृपोत्तमः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य शुशोच च मुमोह च ||
५० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य सलिलस्थः पुनः पुनः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
दीर्घमुष्णं श्वसन्वीरो न किञ्चित्प्रत्यपद्यत ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घलाङ्गूलमाविध्य दिशो व्याप्य स्थितः कपिः ||
५ ग
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घवाहुं महासत्त्वमृषभाक्षमरिन्दमम् |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
दीर्घवाहुं महोरस्कं नीलकुञ्चितमूर्धजम् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
दीर्घवाहुं सुवाहुं च तथैव कनकध्वजम् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
दीर्घवाहुरभिक्रुद्धस्तोत्त्रार्दित इव द्विपः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
दीर्घवाहुर्महातेजा वलरूपसमन्वितः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घवाहुर्महातेजाः प्रज्ञाचक्षुर्नराधिपः |
७८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०८
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घवाहुर्महावाहुर्व्यूढोरुः कनकध्वजः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
दीर्घश्च हरिकेशश्च सुतीर्थः कृष्ण एव च |
४४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घश्मश्रुधरं नॄणां शोणितेन समुक्षितम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
दीर्घसत्रमुपासन्ते दक्षिणाभिर्यतव्रताः ||
११६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
दीर्घसूत्रं समाश्रित्य कार्याकार्यविनिश्चय़े ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
दीर्घसूत्रश्च तत्रैकस्त्रय़ाणां जलचारिणाम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
दीर्घसूत्रस्तु मन्दात्मा हीनवुद्धिरचेतनः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
दीर्घसूत्रस्तु यस्तत्र सोऽव्रवीत्सम्यगुच्यते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
दीर्घसूत्रोऽनृजुः कष्टो गुरुदारप्रधर्षकः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घां वेणीं विधुन्वानः साधु रक्ते च वाससी ||
२७ ग
वन पर्व
अध्याय
२७८
सावित्र्यु उवाच
दीर्घाय़ुरथ वाल्पाय़ुः सगुणो निर्गुणोऽपि वा |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घाय़ुर्जीवति च वै धृतराष्ट्रः पिता तव |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२८२
धौम्य उवाच
दीर्घाय़ुर्लक्षणोपेतस्तथा जीवति सत्यवान् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
दीर्घाय़ुषः समृद्धाश्च विधर्माणो युगक्षय़े ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
दीर्घाय़ुषो महाराज जरामृत्युविवर्जिताः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
दीर्घेभ्यश्च मनुष्येभ्यः प्रमाणादधिको भुवि ||
१२ ग
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
दीर्घेषु नीलेष्वथ चोर्मिमत्सु; जग्राह केशेषु नरेन्द्रपत्नीम् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
दीर्घो द्वादशगव्यूतिः पश्चार्धे पञ्च विस्तृतः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घोष्ठा दीर्घजिह्वाश्च विकराला ह्यधोमुखाः ||
९४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
दीर्घौ वुद्धिमतो वाहू याभ्यां हिंसति हिंसितः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
दीर्घौ वुद्धिमतो वाहू याभ्यां हिंसति हिंसितः ||
६७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
मातो उवाच
दीर्णं हि दृष्ट्वा राजानं सर्वमेवानुदीर्यते |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
दीर्णा इत्येव दीर्यन्ते योधाः शूरतमा अपि |
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
दीर्यते च महत्सैन्यं सृञ्जय़ानां महारणे |
८१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
दीर्यते चोत्तरेणैतत्सैन्यं नः शत्रुसूदन |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्यते युद्धमासाद्य पिपीलिकपुटं यथा ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्यन्ते किं नु गिरय़ः किं स्विद्भूमिर्विदीर्यते |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
दीर्यमाणं वलं दृष्ट्वा युय़ुधानशराहतम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
दीर्यमाणं वलं दृष्ट्वा सौभद्रे विनिपातिते |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
दीव्यतां तुमुले युद्धे प्राणैरमिततेजसाम् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
अर्जुन उवाच
दीव्यते परकामेन तन्नः कीर्तिकरं महत् ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५३
शकुनिरु उवाच
दीव्यामहे पार्थिव मा विशङ्कां; कुरुष्व पाणं च चिरं च मा कृथाः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
५६
वृहदश्व उवाच
दीव्यावेत्यव्रवीद्भ्राता वृषेणेति मुहुर्मुहुः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
दीय़तां दीय़तामेषां भुज्यतां भुज्यतामिति |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
दीय़तां पाण्डुपुत्रेभ्यो राज्यार्धमरिकर्शन |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
अगस्त्य उवाच
दीय़तां पुष्करं मह्यमेष धर्मः सनातनः ||
४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
दीय़तां भुज्यतां चेति दिवारात्रमवारितम् |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
दीय़तां भुज्यतां चेति वाचोऽश्रूय़न्त सर्वशः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
दीय़तां सदृशं मूल्यममात्यैः सह चिन्तय़ ||
९ ख