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कर्ण पर्व
अध्याय २
सञ्जय़ उवाच
अवाङ्मुखाः शस्त्रभृतः सर्व एव विशां पते |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
अवाङ्मुखो न्यस्तशिरा दध्यौ दुष्कृतमात्मनः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
अवाचिनोति कर्माणि न च सम्प्रचिनोति ह |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
अवाच्यः कस्यचिद्भवति कृतय़त्नो यथावलम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
अवाच्यमेतद्वक्तव्यमात्मगुह्यं सनातनम् |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
अवाच्यवादांश्च वहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
अवाच्यापरिमेय़ाश्च व्राह्मणा वनमाश्रिताः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
भगवानु उवाच
अवाच्यास्तु भविष्यामः सर्वलोके महीक्षिताम् ||
८५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
अवाणे भ्रष्टकवचे भ्रष्टभग्नाय़ुधे तथा |
६३ क
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
अवातमशुकादष्टमेकमाम्रफलं किल ||
२८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
अवातरद्रथात्तूर्णं प्रगृह्य सशरं धनुः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
अवातिष्ठत युद्धाय़ शक्रो वृत्रमिवाह्वय़न् ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
अवात्सं वै व्राह्मणच्छद्मनाहं; रामे पुरा दिव्यमस्त्रं चिकीर्षुः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ८४
अष्टक उवाच
अवादीश्चेद्वय़सा यः स वृद्ध; इति राजन्नाभ्यवदः कथञ्चित् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
अवाद्यन्तान्तरिक्षे च भेर्यस्तूर्याणि चाभिभो |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
अवादय़ंश्च गन्धर्वा वाद्यानि विविधानि च ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
अवादय़त्तत्र वीणां मध्ये विश्वावसुः स्वय़म् |
६९ क
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
अवादय़न्त गन्धर्वा जगुश्चाप्सरसां गणाः |
५२ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
अवादय़न्त पाञ्चालाः सिंहनादांश्च नेदिरे ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
अवादय़न्त संहृष्टाः कुरुपाण्डवसैनिकाः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
अवादय़न्दुन्दुभींश्च शतशश्चैव पुष्करान् |
९८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
अवादय़न्पाण्डवेय़ास्तस्मिन्रक्षसि पातिते ||
३४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
अवादय़न्पारिषदाः प्रहृष्टाः कनकप्रभाः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
अवाप च तदा भागं यथोक्तं व्रह्मणा भवः ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
अवाप च परं कीटः पार्थ व्रह्म सनातनम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अवाप तत्पाशुपतं महास्त्रं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०९ ख
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
अवाप्तं चात्मनो मेने स राजा चक्षुषः फलम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अवाप्तः क्षत्रधर्मस्ते राज्यं प्राप्तमकल्मषम् |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
युधिष्ठिर उवाच
अवाप्तमिह विज्ञानं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
अवाप्तमेतद्धि पुरा सनातना; द्धिरण्यगर्भाद्गदतो नराधिप |
३९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
अवाप्तवान्नरश्रेष्ठो वुद्धिनिश्चय़मेव च ||
२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
अवाप्ताः क्रतवो मुख्या वहवो भूरिदक्षिणाः ||
३७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
द्रौणिरु उवाच
अवाप्तानीह तेभ्योऽय़ं मणिर्मम विशिष्यते ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
उत्तङ्क उवाच
अवाप्तार्थोऽहमद्येह भवांश्च पुरुषादकः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
अवाप्तुं रक्षितुं वापि भोक्तुं वा भरतर्षभ ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४२
व्राह्मणा ऊचुः
अवाप्नुवंश्चामरत्वं त्रिषु लोकेषु पूजितम् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
अवाप्नुवन्त वेदोक्तान्संस्कारान्पाण्डवास्तदा |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
युधिष्ठिर उवाच
अवाप्नोति गतिं कां च उपवासपराय़णः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
अवाप्य कीर्तिं च यशश्च लोके; विजित्य शत्रूंश्च धनञ्जय़ोऽपि |
१२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
अवाप्य कुण्डले ते तु राजानं पुनरव्रवीत् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अवाप्य कृच्छ्रं विहितं ह्यरण्ये; दीर्घं कालं चैकमज्ञातचर्याम् |
८६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८५
भीष्म उवाच
अवाप्य तु पुनः सञ्ज्ञां जामदग्न्याय़ धीमते |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अवाप्य दिव्यान्यस्त्राणि गुर्वर्थे सव्यसाचिना |
१२१ क
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
अवाप्य धर्मं परमार्यकर्मा; जगाम सोमस्य महत्स तीर्थम् ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४९
सिद्धा ऊचुः
अवाप्य धर्मं परमार्यकर्मा; जगाम सोमस्य महत्स तीर्थम् ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
अवाप्य नारीरत्नं तत्पुण्यश्लोकोऽपि पार्थिवः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
अवाप्य परमं हर्षं तथेति प्राह वुद्धिमान् ||
३० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
अवाप्य पुरुषो भोज कुरुते वुद्धिवैकृतम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
अवाप्य पृथिवीं कृत्स्नां न ते शृङ्गमवर्धत ||
९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
अवाप्य पृथिवीं कृत्स्नां सौभद्रं न स्मरिष्यसि ||
११ ख