chevron_left  अचिन्तय़ामोपसृत्यarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय २०९
वर्गो उवाच
अचिन्तय़ामोपसृत्य तस्माद्देशात्सुदुःखिताः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
अचिन्तय़ित्वा तान्वाणान्पिता देवव्रतस्तव |
८५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
अचिन्तय़ित्वा भीमस्तु क्रुद्धः कर्णमुपाद्रवत् ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
अचिन्तय़ित्वा स शरांस्तरस्वी; वृकोदरः क्रोधपरीतचेताः |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
अचिराच्चैव दृष्टा त्वं मातुलं मधुसूदन |
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
अचिरात्तस्य नश्यन्ति येषां क्रुद्धोऽसि मानद ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
अचिरात्तु गमिष्यामि येनाहं त्वामचूचुदम् ||
४१ ग
आदि पर्व
अध्याय १६८
गन्धर्व उवाच
अचिरात्स मनुष्येन्द्रो नगरीं पुण्यकर्मणाम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
अचिरादिव सम्प्राप्ता काव्यस्योशनसोऽन्तिकम् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
अचिराद्गमय़ामासुः प्रेतलोकं परस्परम् ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
अचिराद्द्रक्ष्यसे कृष्णे रुदतीर्भरतस्त्रिय़ः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
अचिराद्भगवन्भौममिदं स्थावरजङ्गमम् |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अचिरेण जिताँल्लोकान्हतो युद्धे समश्नुते ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
अचिरेण महाराज तादृशो वै भवत्युत ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
अचिरेण महीं पार्थश्चकार रुधिरोत्तराम् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
अचिरेणातिचक्राम खेचरः खे चरन्निव ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
अचिरेणैव कालेन कीटः पार्थिवसत्तम |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अचिरेणैव कालेन तं तं निघ्नन्ति पाण्डवाः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
अचिरेणैव कालेन नभश्चरति चन्द्रवत् |
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
अचिरेणैव कालेन प्राप्स्यामो यमसादनम् ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
अचिरेणैव कालेन विनश्येत न संशय़ः ||
७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
अचिरेणैव मे पुत्रा भस्मीभूता जनार्दन ||
३३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
अचीर्णव्रह्मचर्यो यः सृष्ट्वावर्तय़ते पुनः |
८ क
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
अचूर्णय़ं वेगवद्भिः शतधैकैकमाहवे ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
अचूर्णय़त्तदा पार्थस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
६२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४७
व्रह्मो उवाच
अचेतनः सत्त्वसङ्घातय़ुक्तः; सत्त्वात्परं चेतय़तेऽन्तरात्मा |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
अचेतनश्चैष मतः प्रकृतिस्थश्च पार्थिव |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
अचेतनाश्चेतय़ितुः कारणादभिसंहिताः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
अचेष्टमानमासीनं श्रीः कञ्चिदुपतिष्ठति |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
अचेष्टमानमासीनं श्रीः कञ्चिदुपतिष्ठति |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
अचोदितो धर्मपरः पुनः संस्कारमर्हति ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७
भीष्म उवाच
अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
अचोदय़त यन्तारं द्रोणानीकाय़ भारत ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
अचोदय़त्ततो वाहान्यतो दुर्योधनस्ततः ||
१३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
अचोदय़द्धय़ांस्तत्र यत्र दुर्मर्षणः स्थितः ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
अचोदय़द्धय़ान्राजन्दुर्योधनवलं प्रति ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
माण्डव्य उवाच
अचौरश्चौरशङ्काय़ां शूले भिन्नो ह्यहं यदा |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय १०९
पाण्डुरु उवाच
अच्छद्मनामाय़या च मृगाणां वध इष्यते |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
अच्छिदं सहसा राजन्नन्तरिक्षे पुनः पुनः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
अच्छिद्रश्छिद्रदर्शी च परेषां विवरानुगः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
अच्छिनत्काममूलं स तेन प्राप महत्सुखम् ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अच्छिनत्सात्यकिस्तूर्णं शरैश्चैवाभ्यवीवृषत् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
अच्छिनत्सात्यकी राजन्नैनं ते प्राप्नुवञ्शराः ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
अच्छिनन्नुत्तमाङ्गानि फलानीव महाद्रुमात् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
अच्छिन्दन्नुत्तमाङ्गानि यत्र यत्र स्म तेऽभवन् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अच्छेद्यः सर्वतो वीर वाजिनश्च मनोजवाः |
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
अच्छेद्याहारमार्गाणि रत्नोच्चय़चितानि च |
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
अच्छेद्योऽय़मदाह्योऽय़मक्लेद्योऽशोष्य एव च |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
पितामह उवाच
अच्युतः पुण्डरीकाक्षः सर्वभूतसमुद्भवः ||
३३ ख