अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
अवाप्य प्राणसन्देहं कार्कश्येन समार्जितम् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
अर्जुन उवाच
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं; राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
अवाप्य राष्ट्राणि वसूनि भोगा; नेषा परा पार्थ सदा रतिस्ते ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
अवाप्य वसुसम्पूर्णां वसुधां वसुधाधिप |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
अवाप्य वासं नरदेवपुत्राः; प्रसादजं वैश्रवणस्य राज्ञः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
अवाप्य स वरं राजन्सर्वलोकपितामहात् ||
१९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
अवाप्यान्कामय़स्वार्थान्नानवाप्यान्कदाचन |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
अवाप्स्यसि च लोकान्वै वसूनां वासवोपम |
९५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
व्यास उवाच
अवाप्स्यसि परं धर्मं धर्मस्थो यदि मन्यसे ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
अवाप्स्यसि सुखं त्वं च शक्रलोकांश्च शाश्वतान् ||
१९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अवाप्स्यसि सुखं राजन्हत्वा शत्रून्परन्तप ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
अवाप्स्यसे पुण्यफलं सुखेन; सर्वो हि लोकोत्तमधर्ममूलः ||
५४ ख
सभा पर्व
अध्याय
५०
दुर्योधन उवाच
अवाप्स्ये वा श्रिय़ं तां हि शेष्ये वा निहतो युधि ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
अवामंस्था मां द्रौपदीतल्पसंस्थो; महारथान्प्रतिहन्मि त्वदर्थे |
८३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
अवामन्यत दुर्वुद्धिर्ध्रुवं नाशमुखे स्थितः ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
अवामन्यत दुर्वुद्धिर्नित्यमस्मान्दुरात्मवान् |
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
अवारोहत मेधावी रथाद्गाण्डीवधन्वनः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
अवारोहद्रथात्तस्मादथ कर्णो महारथः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
अवारोहन्रथेभ्यश्च हस्त्यश्वेभ्यश्च सर्वशः ||
५९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
अवार्या सेतुना गङ्गा दुर्जय़ा व्राह्मणा भुवि ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
अवारय़च्छरैरेव तावद्भिर्निशितैर्दृढैः ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
अवारय़च्छरैस्तीक्ष्णैर्मत्तं द्विपमिवाङ्कुशैः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
अवारय़च्छरौघेण मेघो यद्वद्दिवाकरम् ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
अवारय़त धर्मात्मा दर्शय़न्पाणिलाघवम् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
अवारय़त सङ्क्रुद्धः सर्वसैन्यस्य पश्यतः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
अवारय़त्कूर्मनखैराशुगैर्हृदिकात्मजम् ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
अवारय़त्ततः शूरो भूय़ एव पराक्रमी ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
अवारय़त्स धर्मिष्ठं पूजय़ा प्रतिपूजय़न् ||
७० ख
सभा पर्व
अध्याय
५७
विदुर उवाच
अवालस्त्वं मन्यसे राजपुत्र; वालोऽहमित्येव सुमन्दवुद्धे |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अवालीय़न्त राजेन्द्र वेदनार्ताः शरार्दिताः ||
७३ ख
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
अवासीदच्च कौन्तेय़ दत्तमात्रा मही तदा |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
अवासीदद्रथोपस्थे प्राणान्पीडय़तीव मे ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
अवासीदद्रथोपस्थे मूर्च्छामभिजगाम ह ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
अवासृजं महावाहो तेऽन्तराधिष्ठिताः शराः |
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
अवासृजच्च वेगेन तेषु तान्प्रमथद्वली ||
४ ग
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
अवासृजत मञ्जूषामश्वनद्यास्तदा जले ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
अवासृजदमेय़ात्मा पाञ्चाल्यो रथिनां वरः ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
अवासृजद्रथे तां तु विभेद गदय़ा गदाम् ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
अविः पशूनां सर्वेषामाखुश्च विलवासिनाम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
अविकल्पः पुराधर्मो धर्मवादैस्तु केवलम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
अविकारितमं सत्यं सर्ववर्णेषु भारत ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
अविक्रेय़ं लवणं पक्वमन्नं; दधि क्षीरं मधु तैलं घृतं च |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
अविक्षताः स्म दृश्यन्ते वमन्तो रुधिरं मुखैः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
अविक्षतेन देहेन प्रलय़ं योऽधिगच्छति |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
अविक्षतेन देहेन समराद्यो निवर्तते |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
अविक्षित्प्रवलो धूर्तः कृतवन्धुर्दृढेषुधिः |
१७८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
अविक्षिन्नाम धर्मात्मा शौर्येणेन्द्रसमोऽभवत् |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
अविक्षिन्नाम शत्रुक्षित्स वशे कृतवान्महीम् |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
अविक्षिप्तमना राजन्नेकाग्रः श्रोतुमर्हसि ||
९५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अविग्रहे कौरवाणां दैवं तु वलवत्तरम् ||
३७ ख