अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
अविद्वान्भीरुरल्पार्थो विद्याविक्रमदानजम् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
अविद्वान्मोक्षधर्मेषु वद्धो भ्रमति चक्रवत् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अविद्वान्व्राह्मणो देवः पात्रं वै पावनं महत् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
अविधिश्च विधिश्चैव समुत्पन्नौ तथैकतः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
अविधेय़ा इवादान्ता हय़ाः पथि कुसारथिम् ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
अविधेय़ा इवादान्ता हय़ाः पथि कुसारथिम् ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
अविध्यच्च भृशं तीक्ष्णैः पत्रिभिः शत्रुकर्शनः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
अविध्यच्छीघ्रमाचार्यश्छित्त्वास्य सशरं धनुः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत महाराज तदद्भुतमिवाभवत् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत रणे राजञ्शरैराशीविषोपमैः |
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत रणे राजन्प्रणुन्नं वाक्यसाय़कैः ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
अविध्यत शरैस्तत्र स्वर्भानुः सोमभास्करौ ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत शिनेः पौत्रं जलसन्धो महोरसि ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत्कार्मुकं चास्य क्षुरेण निरकृन्तत ||
६२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत्तावसम्भ्रान्तौ माद्रीपुत्रः प्रतापवान् |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत्तूर्णमव्यग्रः कुरुराजं महोरसि ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत्तूर्णमव्यग्रस्तेऽस्याभ्रश्यन्त वर्मणः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत्तूर्णमव्यग्रो दशभिः कङ्कपत्रिभिः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत्त्रिंशता वाणैर्दशभिश्चास्य सारथिम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत्त्वरितं क्रुद्धः सर्वशस्त्रभृतां वरः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत्त्वरितो राजन्द्रोणं प्रेप्सुर्महामनाः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत्पञ्चभिस्तूर्णं हेमपुङ्खैः शिलाशितैः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत्पुण्डरीकाक्षः शल्यं नय़नसाय़कैः |
७१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत्पृथिवीं पार्थः पार्श्वे भीष्मस्य दक्षिणे ||
२२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत्फल्गुनं राजन्नवत्या निशितैः शरैः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत्सात्यकिः क्रुद्धो वृषसेनं स्तनान्तरे ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
अविध्यत्साधुदान्तान्वै सैन्धवान्सात्वतस्य ह ||
३२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
अविध्यदश्वान्वाह्वोश्च हस्तावापं पृथक्पृथक् ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
अविध्यदाचार्यसुतो नातिक्रुद्धः स्मय़न्निव ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
अविध्यदिन्द्रजित्तीक्ष्णैः सौमित्रिं मर्मभेदिभिः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
अविध्यदिषुभिः षड्भिर्दृढहस्तः स्तनान्तरे ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अविध्यदिषुभिर्गाढं किरीटे सव्यसाचिनम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
अविध्यदेनं दशभिः पृषत्कै; रलम्वुसो राजवरः प्रसह्य |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
अविध्यदेनं निशितैः शराग्रै; रलम्वुसो राजवरार्श्यशृङ्गिः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अविध्यद्दशभिर्भीष्मं छिन्नधन्वानमाहवे |
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
अविध्यद्दशभिर्वाणैः पुरुमित्रं च सप्तभिः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
अविध्यद्दशभिर्वाणैरश्वत्थामानमार्जुनिः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अविध्यद्देवकीपुत्रं हेमपुङ्खैः शिलाशितैः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
अविध्यद्धस्ततलय़ोरुभय़ोरर्जुनस्तदा ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
अविध्यद्भृशसङ्क्रुद्धस्तोत्त्रैरिव महाद्विपम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
अविध्यद्व्राह्मणं सङ्ख्ये हृष्टरूपो विशां पते ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
अविध्यन्नकुलं षष्ट्या सहदेवं च सप्तभिः ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
अविध्यन्नवभिः क्षेमं स हतः प्रापतद्रथात् ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
अविध्यन्नवभिर्वाणैश्चतुर्भिश्चतुरो हय़ान् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
अविध्यन्निशितैर्वाणैर्जत्रुदेशे हसन्निव ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
अविध्यन्निशितैर्वाणैर्वहुभिर्मर्मभेदिभिः ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
अविध्यन्निशितैर्वाणैश्चतुर्भिश्चतुरो हय़ान् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अविध्यन्मां पञ्चभिर्द्रोणपुत्रः; शितैः शरैः पञ्चभिर्वासुदेवम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
अविध्यन्मागधो वीरः पञ्चभिर्निशितैः शरैः ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
अविध्यन्समरेऽन्योन्यं संरव्धा युद्धदुर्मदाः ||
३२ ख