द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
अविध्येतां महावेगैर्निशितैराशुगैर्भृशम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
अविध्येय़ानि हीमानि व्यापादय़ितुमप्यलम् |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
अविनाशं सञ्जय़ पाण्डवाना; मिच्छाम्यहं भूतिमेषां प्रिय़ं च |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
अविनाशी तथा नित्यं क्षेत्रज्ञ इति निश्चय़ः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
अविनाशेन लोकस्य काङ्क्षन्ते पाण्डवाः स्वकम् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
अविनाशोऽस्य सत्त्वस्य निय़तो यदि भारत |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
अविनाशोऽस्य सत्त्वस्य निय़तो यदि भारत |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
अविनीतमनुष्यं तत्क्षिप्रं राष्ट्रं विनश्यति ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
अविनीतश्च दुष्टात्मा प्रत्याख्यातः पुनः पुनः |
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
अविनीतेषु लुव्धेषु सुमहद्दण्डधारणम् ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
अविन्दमानास्त्वथ शर्म सङ्ख्ये; यौधिष्ठिरं ते वलमन्वपद्यन् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
अविन्ध्यो नाम मेधावी वृद्धो राक्षसपुङ्गवः |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
अविन्ध्यो नाम सुप्रज्ञो वृद्धामात्यो विनिर्ययौ ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
अविन्ध्यो हि महावाहो राक्षसो वृद्धसंमतः |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
अविपश्चिद्यथा वाक्यं व्याहरन्नाद्य शोभसे ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
अविप्रणाशः सर्वेषां कर्मणामिति निश्चय़ः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
अविप्रमुक्तो निरय़े च दैत्य; ततः सहस्राणि दशापराणि ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
अविभागगता वुद्धिर्भावे मनसि वर्तते |
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
अविभ्रता पुत्रपौत्रान्देवर्षीनतिथीन्पितॄन् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
अविभ्रदनवद्याङ्गी रूपमन्यदनुत्तमम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अविमुक्तं चरिष्यामस्तत्र का परिदेवना ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
अविमृश्य प्रदेशिन्या दंष्ट्रामादातुमिच्छसि ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
अविमृश्यैव च ततः कृतवानस्मि तत्तथा |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अविरुद्धां त्रिवर्गेण नीतिमेतां युधिष्ठिर |
२०७ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
श्येन उवाच
अविरोधी तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रम ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
अविरोधेन धर्मस्य चचार सुखमुत्तमम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७२
कच उवाच
अविरोधेन धर्मस्य स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे |
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
युधिष्ठिर उवाच
अविरोधेन भूतानां त्यागः षाड्गुण्यकारकः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
अविलुप्यागमं कृत्स्नं विधिज्ञैर्याजकैः कृतम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२८
युधिष्ठिर उवाच
अविलोपमिच्छतां व्राह्मणानां; प्राय़श्चित्तं विहितं यद्विधात्रा |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
अविलोपेन धर्मस्य अनिकृत्या परन्तप |
१०१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
स्वर्ग उवाच
अविवादोऽस्तु युवय़ोरुभौ तुल्यफलौ युवाम् ||
७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
धर्म उवाच
अविवादोऽस्तु युवय़ोर्वित्तं मां धर्ममागतम् |
७५ क
आदि पर्व
अध्याय
७६
यय़ातिरु उवाच
अविवाह्या हि राजानो देवय़ानि पितुस्तव ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
अविवित्सानसूय़ा चाप्येषां समुदय़ो दमः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
अविवेकस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतन्द्रिता |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
अविवेकेन वाक्यस्य नरकः सद्य एव नः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
अविव्रुवन्ती किञ्चित्तु राजानं चारुलोचना |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
अविशङ्कश्च कुशिकस्तथेत्याह स धर्मवित् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
अविशङ्को नरपते प्रीतोऽहं चापि तेन ते |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
गन्धर्व उवाच
अविशिष्टाश्च देवानामनुभावप्रवर्तिताः ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
अविशेषकरो यस्मात्तस्मादेनं त्यजाम्यहम् ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
अविशेषाणि चान्यानि कर्मय़ुक्तानि तानि तु |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
देवा ऊचुः
अविशेषादुद्विजन्तो विशेषार्थमिहागताः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
नारद उवाच
अविशेषेण चैव त्वं प्रजाः संहर भामिनि |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
अविशेषेण तस्याहं कुर्यां धर्मं द्विजोत्तम ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
अविशेषेण सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिरः ||
७ ख