शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
युधिष्ठिर उवाच
हरत्यमरसङ्काश तन्मे व्रूहि पितामह ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
हरनेत्रे शुभे देवी सहसा सा समावृणोत् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
अष्टावक्र उवाच
हरन्ति दोषजातानि नरं जातं यथेच्छकम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
हरन्ति पूर्णात्पूर्णानि पूर्णमेवावशिष्यते |
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
हरन्तीं विविधान्प्रेतान्पाशवद्धान्विमूर्धजान् ||
६५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
हरश्च वहुरूपश्च त्र्यम्वकश्च सुरेश्वरः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
हरस्त्वरिहरो वीर आसीद्यो दानवोत्तमः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
हरस्व शक्र कामं मे न दद्यामहमन्यथा ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
हराम्वुपाखण्डलवित्तगोप्तृभिः; पिनाकपाशाशनिसाय़कोत्तमैः |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
हरिं नाराय़णं ज्ञात्वा यज्ञैरीड्यं तमीश्वरम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
हरिं सहस्रशिरसं सहस्रचरणेक्षणम् |
१४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
हरिकेशस्तथेत्युक्त्वा भूतानां दोषदर्शिवान् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
हरिकेशाय़ मुण्डाय़ कृशाय़ोत्तरणाय़ च ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
हरिकेशाय़ मुण्डाय़ कृशाय़ोत्तारणाय़ च |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१७५
वैशम्पाय़न उवाच
हरिचन्दनमिश्राणि तुङ्गकालीय़कान्यपि ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
हरिणा चन्दनेनाङ्गमनुलिप्य महाभुजः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
हरिणाश्वादसिं लेभे शुनकः शुनकादपि ||
७७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
हरिणैश्चञ्चलापाङ्गैर्हरिणीसहितैर्वने |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
हरिताम्वुजसञ्छन्नां दिव्यां कनकपुष्कराम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
हरितारुणवर्णानां शाद्वलानां समन्ततः |
७५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
हरितेषु सुवर्णेषु वर्हिष्केषु नवेषु च |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
हरिपिङ्गो हरिश्मश्रुः प्रमाणाय़ामतः समः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
हरिरेव हि क्षेत्रज्ञो निर्ममो निष्कलस्तथा |
५४ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
हरिर्नाराय़णो देवो महादेवस्तथैव च ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
हरिर्यथा गिरेः शृङ्गं समाक्रामदरिन्दमः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
हरिर्वसति वैकुण्ठः शकटे कनकात्मके ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
हरिवंशस्ततः पर्व पुराणं खिलसञ्ज्ञितम् |
६९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
हरिवक्त्राः क्रौञ्चमुखाः कपोतेभमुखास्तथा ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
हरिवभ्रुश्च कौण्डिन्यो वभ्रुमाली सनातनः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
हरिवास विशामीश विश्वावासामिताव्यय ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरस्कृतः ||
६८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
हरिश्च हरिणाक्षश्च सर्वभूतहरः प्रभुः ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
हरिश्चन्द्रं च राजर्षिं रोचमानं विशेषतः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
हरिश्चन्द्रः पार्थिवेन्द्रः श्रुतस्ते; यज्ञैरिष्ट्वा पुण्यकृद्वीतशोकः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
हरिश्चन्द्रक्रतौ देवांस्तोषय़ित्वात्मतेजसा |
७ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
हरिश्चन्द्रसमाः पार्थ येषु त्वं विहरिष्यसि ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
हरिश्चन्द्रे श्रिय़ं दृष्ट्वा नृपतौ जातविस्मय़ः ||
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
हरिश्चन्द्रो मरुत्तश्च जह्नुर्जाह्नविसेविता ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
हरिश्मश्रुर्जटी भीमो भय़कर्ता सुरद्विषाम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
३०
सूत उवाच
हरिष्यामि विनिक्षिप्तं सोममित्यनुभाष्य तम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
धृतराष्ट्र उवाच
हरिस्त्रैलोक्यनाथः स किं नु तस्य न निर्जितम् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
हरीन्द्रय़ोर्यथा राजन्वालिसुग्रीवय़ोः पुरा ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
हरेः स्तोत्रार्थमुद्भूता वुद्धिर्वुद्धिमतां वर |
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
हरेज्ज्येष्ठः प्रधानांशमेकं तुल्यासुतेष्वपि |
६० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२५
भीष्म उवाच
हरेत यो वै सर्वस्वं तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
हरेत्काकः पुरोडाशं यदि दण्डो न पालय़ेत् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
हरेत्कीर्तिं धर्ममस्योपरुन्ध्या; दर्थे दीर्घं वीर्यमस्योपहन्यात् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
हरेत्तद्द्रविणं राजन्धार्मिकः पृथिवीपतिः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
हरेत्तु दशमं भागं शूद्रापुत्रः पितुर्धनात् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
हरेद्देवानाममृतं प्रसह्य; युद्धेन यो वासुदेवं जिगीषेत् ||
६७ ख