उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम् |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
गुरुराहवनीय़स्तु साग्नित्रेता गरीय़सी ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
गुरुर्गरीय़सां श्रेष्ठः पुत्रः स्पर्शवतां वरः ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
गुरुर्गरीय़ान्पितृतो मातृतश्चेति मे मतिः ||
१६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
गुरुर्द्विजातिर्धर्मात्मा यदेवं पीडितः शरैः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
गुरुर्धर्मोपदेशेन गोप्ता च परिपालनात् ||
१०२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
अर्जुन उवाच
गुरुर्भवान्न मे शत्रुः शिष्यः पुत्रसमोऽस्मि ते |
३३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
गुरुर्मतो भवानस्य कृत्स्नस्य जगतः प्रभुः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
गुरुर्वा यदि वा मित्रं प्रतिहन्तव्य एव सः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
गुरुर्वोद्धा च शत्रुश्च द्वेष्टा च हृदि संश्रितः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
गुरुर्हि सर्ववर्णानां ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च वै द्विजः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
गुरुर्हि सर्ववर्णानां व्राह्मणः प्रसृताग्रभुक् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१३१
श्येन उवाच
गुरुलाघवमाज्ञाय़ धर्माधर्मविनिश्चय़े |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
गुरुवत्पूजय़ामास कांश्चित्कांश्चिद्वय़स्यवत् |
३९ क
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
गुरुवद्भूतगुरवे प्राहिणोद्दूतमञ्जसा ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
गुरुवन्नाभ्यनन्दन्त कुमारान्नान्वपालय़न् ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
गुरुवन्मानवगुरुं मानय़ित्वा मनस्विनम् ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
गुरुवर्ती च तेनास्त्रं सञ्जहारार्जुनः पुनः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
गुरुवात्सल्यमत्यन्तं नैभृत्यं विनय़ो दमः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
गुरुवृत्तं न जानीषे तस्माद्योत्स्याम्यहं त्वय़ा ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कृप उवाच
गुरुवृत्तिरताः प्राज्ञा धर्मनित्या यशस्विनः ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
कश्यप उवाच
गुरुशास्त्रे निवद्धानामन्योन्यमभिशङ्किनाम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
गुरुशुश्रूषणं सत्यमक्रोधो दानमेव च |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
गुरुशुश्रूषवो दान्ता व्रह्मण्याः सत्यवादिनः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
गुरुशुश्रूषवो दान्ताः शिष्टाचारा भवन्त्युत ||
७४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
गुरुशुश्रूषय़ा कुन्त्या यमय़ोर्विनय़ेन च |
८१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
नारद उवाच
गुरुशुश्रूषय़ा चैव जननी तव पाण्डव |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
गुरुशुश्रूषय़ा ज्ञानं शान्तिं त्यागेन विन्दति ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
गुरुशुश्रूषय़ा विद्या नित्यश्राद्धेन सन्ततिः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
गुरुशुश्रूषय़ा शूराः पितृशुश्रूषय़ापरे |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
गुरुश्च नरशार्दूल परिचर्या यथातथम् ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
गुरुस्थाना गुरवश्चैव सर्वे; तेषामग्रे नोत्सहे स्थातुमेवम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२०५
मार्कण्डेय़ उवाच
गुरू निवेद्य विप्राय़ तौ मातापितरावुभौ |
१ क
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
गुरूंश्चाप्यवमन्यन्त न तु रामजनार्दनौ |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
गुरूंश्चैव विनिन्दन्ति मूढाः पण्डितमानिनः ||
३२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
गुरूणां चानुपूर्व्येण प्रेतकार्याणि कारय़ ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
युधिष्ठिर उवाच
गुरूणां चापि शुश्रूषा तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८८
युधिष्ठिर उवाच
गुरूणां चैव सर्वेषां जनित्री परमो गुरुः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
कामन्द उवाच
गुरूणां हि प्रसादाद्धि श्रेय़ः परमवाप्स्यसि ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
गुरूणामनृणो भूत्वा समावर्तेत यज्ञवित् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
गुरूणामवमानो हि वध इत्यभिधीय़ते ||
१०९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
गुरूणामेव सत्कारं विदुर्देवाः सहर्षिभिः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
गुरूणीति विदित्वाथ न ग्राह्याण्यत्रिरव्रवीत् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
गुरूनभ्यर्च्य युज्यन्ते आय़ुषा यशसा श्रिय़ा ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
गुरूनभ्यर्च्य वर्धन्ते आय़ुषा यशसा श्रिय़ा ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
गुरूनभ्युपगच्छन्ति यशसोऽर्थाय़ भामिनि ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
अर्जुन उवाच
गुरूनहत्वा हि महानुभावा; ञ्श्रेय़ो भोक्तुं भैक्षमपीह लोके |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
गुरोः प्रिय़हिते युक्तः सत्यधर्मपरः शुचिः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
गुरोः सकाशात्समवाप्य विद्यां; भित्त्वा कुक्षिं निर्विचक्राम विप्रः |
४९ क