chevron_left  अव्यक्ताद्व्यक्तय़ःarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
अव्यक्ताद्व्यक्तय़ः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
अव्यक्तिके पुरे शेते पुरुषश्चेति कथ्यते ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
अव्यक्ते पुरुषं याते पुंसि सर्वगतेऽपि च |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
अव्यक्तेष्वपराधेषु चिरकारी प्रशस्यते ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तैकत्वमित्याहुर्नानात्वं पुरुषस्तथा |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
अव्यक्तोऽय़मचिन्त्योऽय़मविकार्योऽय़मुच्यते |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
अव्यक्तय़ोनिर्भगवान्दुर्दर्शः पुरुषोत्तमः |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
अव्यग्रः प्रेषय़ामास जय़ार्थी विजय़ं प्रति ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
धृतराष्ट्र उवाच
अव्यग्रांश्च प्रहृष्टांश्च नित्यं शंससि पाण्डवान् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
धृतराष्ट्र उवाच
अव्यग्रानेव हि परान्कथय़स्यपराजितान् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
अव्यग्रो याहीति ||
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
अव्ययं च व्ययं चैव द्वय़ं स्थावरजङ्गमम् ||
४६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
अव्ययत्वाच्च निर्द्वन्द्वं द्वन्द्वाभावात्ततः परम् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ३३
वासुकिरु उवाच
अव्ययस्याप्रमेय़स्य सत्यस्य च तथाग्रतः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
अव्ययात्तत्र यत्र स्म द्रोणः पाण्डून्प्रमर्दति ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
अव्यवस्था च सर्वत्र तद्वै नाशनमात्मनः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५७
भीष्म उवाच
अव्यवस्थितमर्यादैर्विमूढैर्नास्तिकैर्नरैः |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ५७
विदुर उवाच
अव्याधिजं कटुकं तीक्ष्णमुष्णं; यशोमुषं परुषं पूतिगन्धि |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
अव्याधिजं कटुकं शीर्षरोगं; पापानुवन्धं परुषं तीक्ष्णमुग्रम् |
६६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अव्याधिजं कटुकं शीर्षरोगं; यशोमुषं पापफलोदय़ं च |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
अव्यापारः परार्थेषु नित्योद्योगः स्वकर्मसु |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
अव्याहतमनाय़ासममृतं चाविय़ोगि च ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
अव्याहतैश्चेतय़ते न वेत्ति विषमागतैः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
अव्याहरति कौन्तेय़े धर्मपुत्रे युधिष्ठिरे |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
अव्याहरति कौन्तेय़े धर्मराजे युधिष्ठिरे |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
भीष्म उवाच
अव्याहृतं व्याजहार सत्यवानिति नः श्रुतम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
अव्याहृतं व्याहृताच्छ्रेय़ आहुः; सत्यं वदेद्व्याहृतं तद्द्वितीय़म् |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
हंस उवाच
अव्याहृतं व्याहृताच्छ्रेय़ आहुः; सत्यं वदेद्व्याहृतं तद्द्वितीय़म् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७८
राजो उवाच
अव्युच्छेत्तास्मि सर्वेषां मामकान्तरमाविशः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
अव्युत्क्रान्ताश्च धर्मेषु पाषण्डसमय़ेषु च |
५६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २२
स्त्र्यु उवाच
अव्युत्थानेन ते लोका जिताः सत्यपराक्रम ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
अव्युत्पन्नं समानार्थं तुल्यमित्रं युधिष्ठिरम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
अव्यूहत स्वय़ं व्यूहं भीष्मो व्यूहविशारदः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
अव्यूहतार्जुनो व्यूहं पुत्रस्य तव दुर्नय़े ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अव्यूहन्त महाव्यूहं पाण्डूनां प्रतिवाधने ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
अव्यूहन्मानुषं व्यूहं दैवं गान्धर्वमासुरम् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
अव्रता नष्टमर्यादास्ते प्रोक्ता व्रह्मराक्षसाः ||
६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
उमो उवाच
अव्रता भ्रष्टनिय़मास्तथान्ये राक्षसोपमाः ||
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
अव्रतानामुपाध्याय़ः काण्डपृष्ठस्तथैव च ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
अव्रती कितवः स्तेनः प्राणिविक्रय़्यथो वणिक् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
अव्रती वृषलीभर्ता कुण्डाशी सोमविक्रय़ी |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६
शल्य उवाच
अव्रवीच्च गुरुं देवो वृहस्पतिमुपस्थितम् ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रवीच्च ततो जिष्णुः प्रहसन्निव भारत |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीच्च ततो राजन्दुर्योधनमिदं वचः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीच्च तदा कर्णं पुत्रो दुर्योधनस्तव |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीच्च तदा कर्णो गुरुं शारद्वतं कृपम् ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीच्च तदा भीमः पार्षतं शत्रुतापनम् |
६४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीच्च तदा राजन्भीष्मं कुरुपितामहम् ||
३ ख