शल्य पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीच्च तदा रामो दृष्ट्वा कृष्णं च पाण्डवम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीच्च न मे जीवञ्जीवतो युधि मोक्ष्यसे ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीच्च नरव्याघ्रः प्रहसन्निव तान्नृपान् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रवीच्च पुनर्भीमं रोषात्प्रस्फुरिताधरः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीच्च पुरा भीष्मो नाहं हन्यां शिखण्डिनम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
अव्रवीच्च भृशं तुष्टो विश्वामित्रो मुनिं तदा ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीच्च महावाहुर्भीमसेनं परन्तपः |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
अव्रवीच्च मुदा युक्तः पुनरागमनं प्रति |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
अव्रवीच्च मुनीन्सर्वान्नापराध्यन्ति वै स्त्रिय़ः |
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीच्च विशुद्धात्मा नाहं हन्यां शिखण्डिनम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीच्च विशुद्धात्मा नाहं हन्यां शिखण्डिनम् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रवीच्च विशुद्धात्मा सर्वं विश्रावय़ञ्जगत् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
ऋषभ उवाच
अव्रवीच्च हि तं वाक्यं राजा राजीवलोचनः |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रवीच्चैनमासीनं राजसंसदि भारत ||
६८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रवीच्चैव तां राजा सान्त्वपूर्वमिदं वचः ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
५३
नल उवाच
अव्रवीच्चैव मां वाला आय़ान्तु सहिताः सुराः |
१९ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रवीच्छोकसन्तप्तः सहस्राक्षमिदं वचः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
अव्रवीत्कर्णसहितं दुर्योधनमिदं वचः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
अव्रवीत्कस्य हेतोस्त्वमास्थितस्तप उत्तमम् ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रवीत्किल दाशार्ह वैराटीमार्जुनिः पुरा |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीत्कुरुशार्दूलो दुर्योधनमिदं वचः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९८
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रवीत्कुशलं राजन्प्रीय़माणः पुनः पुनः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रवीत्कृतवर्माणं क्षिप्रं योजय़ वाहिनीम् ||
१० ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रवीत्कृतवर्माणमवहस्यावमन्य च ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रवीत्क्रिय़तामेषां सूतानां परमक्रिय़ा ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीत्क्षत्रिय़ांस्तत्र धर्मराजो युधिष्ठिरः |
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीत्तं तदा हृष्टस्त्वय़मस्म्यनुशाधि माम् ||
३८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
अव्रवीत्तत्र गाङ्गेय़ं मन्त्रिमध्ये द्विजर्षभ ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीत्तत्र गोविन्दो हर्षय़न्सर्वपाण्डवान् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
अव्रवीत्तत्र तं हंसं तमप्येवं नलं वद ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीत्तत्र तेजस्वी सोऽभिसृत्य जनाधिपम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीत्तनय़ं तुभ्यं क्रोधादुद्वृत्य चक्षुषी ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीत्तव पुत्रं तु सामपूर्वमिदं वचः ||
३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीत्तव पुत्रस्तु दुःशासनमिदं वचः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
अव्रवीत्तव भर्तैष नात्र कार्या विचारणा ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
अव्रवीत्तस्य वहुशो गुणान्देव्याः समीपतः |
१४० क
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीत्तावकान्योधान्भीमोऽय़ं युधि वध्यताम् ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीत्तावकान्सर्वांस्त्वरध्वमिति भारत ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीत्तावकान्सर्वान्युध्यध्वमिति दंशिताः ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीत्तावकान्सर्वान्संनह्यन्तां महारथाः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
अव्रवीत्तास्तदा वाक्यं शुकः परमधर्मवित् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
अव्रवीत्तु स मां क्रोधात्तव पूर्वपितामहः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
अव्रवीत्त्रिदशांस्तत्र हर्षय़न्निव मां तदा ||
१७० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
अव्रवीत्त्वरितो गत्वा भीष्मं शान्तनवं वचः ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
अव्रवीत्पन्नगं मृत्युं लुव्धमर्जुनकं च तम् ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
अव्रवीत्परमं मोक्षं यत्तत्साङ्ख्यं विधीय़ते ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
अव्रवीत्परमप्रीतः सुतेय़ं वरवर्णिनी ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
अव्रवीत्परमप्रीतः स्वशक्त्या किं करोमि वः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रवीत्परमप्रीतो दिष्ट्या दिष्ट्येति भारत ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रवीत्परवीरघ्नं दाशार्हमपराजितम् ||
५० ख