अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
अच्युतश्च्यावनोऽरीणां सङ्कृतिर्विकृतिर्वृषः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
अच्युताच्युत मा मैवं व्याहरामित्रकर्षण |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
अजं पुराणमजरं सनातनं; यदिन्द्रिय़ैरुपलभते नरोऽचलः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
अजकस्त्वनुजो राजन्य आसीद्वृषपर्वणः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
अजगरचरितं व्रतं महात्मा; य इह नरोऽनुचरेद्विनीतरागः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अजपा नास्तिकाः स्तेना भविष्यन्ति युगक्षय़े ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अजपा व्राह्मणाश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति केतनम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अजपा व्राह्मणास्तात शूद्रा जपपराय़णाः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
अजमीढं सुमीढं च पुरुमीढं च भारत ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
अजमीढस्य चतुर्विंशं पुत्रशतं वभूव कैकेय़्यां नागाय़ां गान्धार्यां विमलाय़ामृक्षाय़ां चेति |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
अजमीढो वरस्तेषां तस्मिन्वंशः प्रतिष्ठितः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
अजमीशानमव्यग्रं कारणात्मानमच्युतम् ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
अजरः सोऽमरश्चैव व्यक्ताव्यक्तोपदेशवान् |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
अजरममरमप्रसाद्य रुद्रं; जगति पुमानिह को लभेत शान्तिम् ||
९८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
अजरश्चामरश्च स्याममृतेन विनाप्यहम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
पराशर उवाच
अजरश्चामरश्चैव पराशर सुतस्तव ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
अजरश्चामरश्चैव भव दुःखविवर्जितः |
१९१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
अजरश्चामरश्चैव भविता दुःखवर्जितः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
अजरां ज्यामिमां चापि गाण्डीवे समय़ोजय़त् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
अजराणामदुःखानां शतवर्षसहस्रिणाम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
अजरोऽय़ममृत्युश्च राजासौ मन्यते तथा ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७२
भीमसेन उवाच
अजविन्दुः सुवीराणां सुराष्ट्राणां कुशर्द्धिकः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
अजश्च कांस्यं च रथश्च नित्यं; मध्वाकर्षः शकुनिः श्रोत्रिय़श्च |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
अजश्च मृगरूपश्च गन्धधारी कपर्द्यपि |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
अजश्चराचरगुरुः स्रष्टा त्वं पुरुषोत्तम ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
अजश्चरो दिवारात्रमतन्द्रितश्च; स तं मत्वा कविरास्ते प्रसन्नः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
अजश्चाश्वश्च मेषश्च गौश्च पक्षिगणाश्च ये |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
ऋषय़ ऊचुः
अजसञ्ज्ञानि वीजानि छागं न घ्नन्तुमर्हथ ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
अजस्य नाभावध्येकं यस्मिन्विश्वं प्रतिष्ठितम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
अजस्रं चैव वर्तन्ते वसेत्तत्राविचारय़न् ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
अजस्रं जन्मनिधनं चिन्तय़ित्वा त्रय़ीमिमाम् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
अजस्रं त्विह क्रीडार्थं विकुर्वन्ती नराधिप |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
अजस्रं निपतत्स्वग्नौ नागेषु भृशदुःखितः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
अजस्रं परिय़ात्येष सत्येनावतपन्प्रजाः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
अजस्रं शैलशृङ्गाणां वज्रेणाहन्यतामिव ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
अजस्रं सर्वलोकस्य कः कुतो वा न वा कुतः ||
१२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अजस्रमन्वकीर्यन्त शराः पार्थरथं प्रति ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
अजस्रमुपय़ोक्तव्यं फलं गोमिषु सर्वतः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
अजस्रमेव दुःखार्तोऽदुःखितः सुखसञ्ज्ञितः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
अजस्रमेव मोहार्तो दुःखेषु सुखसञ्ज्ञितः |
५६ क
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
अजाः शिवानां च रुतमन्वकुर्वत भारत ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
अजातकांस्तथा जीरान्दाडिमान्वीजपूरकान् ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
१९४
कर्ण उवाच
अजातपक्षाः शिशवः शकिता नैव वाधितुम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
अजातशत्रुं कुशलं स्म पृच्छेः; पुनः पुनः प्रीतिय़ुक्तं वदेस्त्वम् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
अजातशत्रुं कौन्तेय़ं ज्वलन्तमिव पावकम् |
३९ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
अजातशत्रुं कौन्तेय़मभ्यधावद्युधिष्ठिरम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुं कौन्तेय़मिदं वचनमर्थवत् ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
अजातशत्रुं कौरव्यं मग्नं दुर्द्यूतदेविनम् ||
२३ ख